Tuesday, September 18, 2012

नारीवादियों अपना मानसिक संतुलन बनाए रखो

कुछ स्त्रियों पर नारीवाद का भूत इस कदर सवार हो गया है कि सही और गलत कि पहचान ही खो दी उन्होंने !  यदि स्त्री गलत भी होती है तो भी वे उसके समर्थन में झंडा लेकर खड़ी हो जाती हैं ! गलतियाँ तो स्त्री-पुरुष दोनों से ही हो सकती हैं न , फिर स्त्रियों कि गलतियों , उनके अत्याचार , उनकी गद्दारी और उनकी अशिष्टता पर पर्दा क्यों डाला जाए ?  जब स्त्री के अपराधों को नारीवादी महिलाएं छुपाती हैं तो समाज में एक असंतुलन पैदा होता है ! मासूम स्त्रियाँ दिग्भ्रमित भी होती हैं, गलत कार्यों को बपौती समझ कर करने के लिए प्रेरित होती हैं !  नारीवादियों के आँचल तले पनपने लगता है स्त्रियों द्वारा किया जाने वाला अन्याय और अत्याचार  !

कल एक नारीवादी महिला मुझसे बहस करने लगी , बात कुछ सशक्त नारियों की गलत सोच पर हो रही थी ! बातों के दौरान , सोनिया गांधी का जिक्र आ गया! मेरे विचार से इटली की इस विदेशी महिला से बड़ा गद्दार और दुश्मन कोई नहीं है इस देश का  ! जिन्होंने उसके होटल में पिज्जा बेचने से लेकर  भारत-भूमि पर अतिक्रमण की कथा पूरी जानी उसे पता है की कैसे उसने  अपने परिवार का विनाश किया और अब भारत देश को तिल-तिल लूट रही है ! कांग्रेस जैसे गद्दार संगठन के माध्यम से देश को खोखला कर रही है , आतंकवादियों को प्रश्रय दे रही है ! घोटालों और  बम-ब्लास्ट की जिम्मेदार है ! पार्टी के सदस्यों को कब्जे में रखकर मनमाना आतंक फैला रही है !  

ऐसी स्त्री के विरोध में मेरे राष्ट्रवादी विचारों का विरोध करती हैं ये नारिवादियाँ !  एक बात स्पष्ट कर दूं , मैं नारीवादी नहीं हूँ , लिंग-भेद नहीं करती ! नारी सशक्तिकरण में विश्वास रखती हूँ , लेकिन  पागल नहीं हूँ जो गलत स्त्रियों का भी समर्थन करूँ जबरदस्ती !  अब मायावती, सोनिया, बिपाशा, पूनम पांडे और मल्लिका जैसी  महिलाओं का समर्थन मुझसे नहीं होगा !

अंत में एक चेतावनी नारीवादियों को---

राष्ट्रवादियों से मत उलझो नारीवादियों !  मेरे लिए , नारी सशक्तिकरण से ऊपर है देश के लिए लड़ना !

भारत माता की जय !

वन्दे मातरम् !

16 comments:

पूरण खंडेलवाल said...

गलत को गलत ही कहना होगा चाहे वो नारी हो या पुरुष !!

वन्दना said...

देश हर चीज से ऊपर होता है।

HAKEEM YUNUS KHAN said...

देश हित आगे और अपने पराये का भेद पीछे रहना ही चाहिए।

Rajesh Kumari said...

यही कारण है दिव्या जो मैं भी इसी तरह के ब्लॉग पर नहीं जाती जहां अपनी जिम्मेदाराना ,गैर जिमीदाराना बातों पर अपेक्षा करती हैं सभी की स्वीकृति का

दिवस said...

आपके इन्ही विचारों के कारण ही तो कथित नारिवादियाँ आपसे उलझती हैं। दरअसल उन्हें खुद के नारीवादी होने का भ्रम है जो नारी को कुल्टा बनने पर भी नारीवाद की चादर से ढककर उसे जायज़ ठहराना चाहती हैं। इस प्रकार वे नारी का अहित ही कर रही हैं।
अब सोनिया जैसी नारी को नारीवाद की आड़ में बचाना कितना घोर अपराध है यह इन नारीवादियों(?) को क्या समझ आएगा? इन्हें तो यह भी नहीं पता कि एक स्त्री के लिए नारी शब्द एक गाली के समान है। हमारे प्राचीन वेदों में स्त्री शब्द का उपयोग किया गया है, नारी शब्द सोनिया जैसी स्त्रियों के लिए उपयोग में लाया जाता था।
बहरहाल इन कथित नारीवादियों को अपना स्तर बढ़ाना होगा और नारीवाद से उठकर राष्ट्रवाद को अपनाना होगा। ऐसा कर ही वे सही मायने में स्त्रियों का कल्याण कर सकेंगी।
आपके बेबाक विचारों व लेखनी ने इन नारीवादियों को अवश्य ही सोचने पर मजबूर किया होगा।
जय माँ भारती

Maheshwari kaneri said...

गलत तो गलत ही होता है.सबसे पहले देश हित है..

DR. PAWAN K. MISHRA said...

मानव जीवन के उद्विकास के क्रम में ढेर सारे पड़ाव आये मसलन वह कपडे पहनने लगा परिवार बना कर रहने लगा राज्य की स्थापना हुई अधिकारों और कर्तब्यो के सहारे मानव जीवन व्यवस्थित होने की और बढ़ा. सेटल्ड होना मानव का सहज स्वभाव है. किन्तु मानव उतना ही सेटल्ड होगा जितने उसमे हैवानो वाली प्रवृत्तिया कम होंगी. जानवर का सहज स्वभाव है की वह मूल प्रवृत्तियों (बेसिक इंस्टिंक्ट) के सहारे क्रिया करता है जबकि मानव संबंधो और व्यवहार के सहारे क्रिया करता है.भोजन, नीद, सेक्स और सुरक्षा की आवश्यकता मानव और पशु दोनों को होती है. फर्क पद्धति में है. फर्क संस्कृति का है. कच्चा मांस खाना व्यभिचार और सुरक्षित होने के लिए खून की नदिया बहा देने का क्रम सांस्कृतिक विकास कम होता गया.आजकल की सभ्यता में जो प्रवृत्तिया उभर रही है उसे देखकर लगता है कि घोर अव्यस्थितता की और हम तेजी से लुढ़कते जा रहे है. यह लुढकाव रोमांचक लगता है. यह लुढकाव आधुनिक होने का बोध करता है. समाज में आपको अलग छवि प्रदान करता है. आपको बोल्ड (बोल्ड के अनेक अर्थ है सभी पाठक अपने अपने अनुसार अर्थ लगाने के लिए स्वतंत्र है.) बनाता है.मसलन आप कपडे उतार दे तो आप निर्लज्ज नहीं बोल्ड कहलायेगे. (यदि कपडे उतरना बोल्डनेस है तो जानवर हमसे हजार गुना बोल्ड और फैशनेबुल हैं. )
होता क्या है कि हर सीकिया पहलवान में गामा पहलवान बनाने की जबरदस्त इच्छा होती है लेकिन उसके लिए वह अपना सीकियापन छोड़ने को तैयार नहीं होता या छोड़ ही नही पाता. फिर बड़ी बड़ी हांकने लगता है और बन जाता है बोल्ड.
प्रत्येक पुरुष और महिला नहाते समय नग्न होता है तो क्या चौराहे पर खडा होकर नंगा नहाए और बोले कि मै तो बोल्ड हूँ आप खुद सोचिये.
नारीवादियो का ब्रम्हवाक्य... नारी पैदा नही होती बनायी जाती है. इस सूक्त की रचयिता को दूर से प्रणाम. सिमोन डि बोवार(फ्रांसीसी) द्वारा कहित इसी सेंटेंस ने बमचक काट रखा है. पहले इसी को लत्ता करते है. ऐक्चुअली मे एक अपराधशास्त्री हुए थे लोम्ब्रोसो(इटली वाले). उन्होने अपराध करने का प्रारूपवादी सिद्धांत दिया था जिसके अनुसार शरीर की बनावट के आधार पर अपराधी की पहचान की जाती थी. इस सिद्धांत का खंडन दूसरे अपराधशास्त्री सदरर्लैंड(अमेरिका वाले) ने अपराध का समाजशास्त्रीय सिद्धांत दिया और एक वाक्य की रचना की अपराधी पैदा नही होते बनाये जाते है. अब सिमोन ने इस वाक्य को देखा दिमाग की बत्ती जली और तुरंत ब्रम्हवाक्य गढ दिया. सुधी पाठक दोनो वाक्य देखे तो स्पष्ट हो जायेगा कि चोट्टिन सिमोन ने सदरर्लैंड के वाक्य का अपराधी हटा कर नारी जोड दिया. अब क्या था लहर चल गयी. पर सिमोन कही न कही लेडी मैक्बेथ ग्रंथि की शिकार हो गयी और जा गिरी ज्या पाल सार्त्र (ये भी फ्रांसीसी) की गोदी मे. कहानी खतम.

लेकिन साप के जाने के बाद असली कहानी लकीर पीटने वाले/वालियो की है. इन लकीरपिटवो से मै पूछना चाहता हू क्या नारी महज सामाजिक या सांस्कृतिक शब्द ही है. क्या यह जैविक नही है. उनके शरीर की बनावट और उसमे हार्मोंस का अलग अलग होना नारी और पुरुष होने के लिये जिम्मेदार नही है. पौरुष के लिये जिम्मेदार टेस्टोरान हारमोन शरीर को कडा और टफ बनाता है आवाज भारी करता है. इसके विपरीत् एस्ट्रोजेन कोमलता और पतली आवाज के लिये जिम्मेदार है जो नारीत्व का निर्माण करता है. मतलब नारी पैदा होती है.
cont......

DR. PAWAN K. MISHRA said...

नारीवाद का दूसरा और भयंकर दौर शुरु होता है केटी मिलर के अभ्युदय से. इन्होने अंत:वस्त्रो को नारीपरतंत्रता से जोडकर देखा और समस्त नारियो को अंत:वस्त्र मुक्त होने की सलाह दी खूब अंत:वस्त्रो की होलिया जली. लोगो ने जमकर लुत्फ लिया. इन्होने खुली बहस के लिये मरद जात को चुनौती दी. एक मेयर नाम के सज्जन ने चुनौती कबूल की और बहस शुरु हुयी. नगर की सारी जनता इस बहस को सुनने के लिये आयी हुयी थी. खूब जवाबी कीर्तन हुआ. बातो बातो मे मेयर ने कहा चलिये ठीक है आप मरद से कम नही है मरदो से एक कदम आगे ही है. अब आप मेरा बलात्कार कर दीजिये. पिन ड्राप साईलेंस. केटी के ज्ञान चक्षु खुल गये उनको बोध हो गया.और वह बिना बोले चली गयी. बाद मे केटी ने एक साधारण व्यक्ति से विवाह कर बाकी जीवन सुखपूर्वक बिताया. लेकिन लकीरपिटवे लकीर पीटते ही रहे.
ये दोनो उद्धरण मैने इसलिये दिया क्योकि इसी के आधार पर नारीवाद का ढोल पिटता है. बाकी यदि बात वंचनाओ की हो तो उसके अनेक आयाम है. स्वतंत्रता और परतंत्रता की सापेक्ष परिभाषाये है. अगर औरत घर मे परतंत्र है तो वह द्फ्तर मे स्वतंत्र कैसे रह सकती है वहा भी बास की गुलामी करनी पडती है. जो फौजी सीमा पर जान देता है क्या उसको जान देने के लिये ही पैसे मिलते है. मजाक बना के रख दिया है स्त्री स्वतंत्रता शब्द को. जब जो मन हो फेचकुरियाने लगे. अरे आदमी और औरत का सम्बन्ध ताला और चाभी जैसे है अगर ताला होने को समानता मान लिया जाय तो जीवन का कमरा कभी भी आबाद नही हो सकता.
मै फिर कहता हू कि मानव व्यवस्था मे ही जी सकता है. और सेक्स का नियमन व्यवस्था का पहला और सबसे महत्वपूर्ण आधार है. जो सेक्स पर नियमन नही चाहते उनके लिये भी एक जगह है जहा वो आराम से गुजर कर सकते है और वह जगह है रेड लाईट एरिया. जो भी आदमी औरत चाहे वहा रहे पर शर्त है कि वह कभी भी व्यवस्था मे जीने की बात नही करेगे. हद हो गयी. चित भी मेरी पट भी मेरी अंटा मेरे बाप का.
जीने का आधार सम्बन्ध है. आपके घर मे खूब पैसा लेकिन सम्बन्ध ख्रराब है तो आप सही जीवन नही जी पाते या कम पैसो मे सम्बन्धो के आधार पर सुखद जीवन जीते है. वो गाना है ना.. तेरा साथ है तो मुझे क्या कमी है. सम्बन्धपूर्वक जीवन मे वाकई कोई कमी नही रहती. औरत के आधार पर सबन्धो का निर्माण होता है और उसी के आधार पर सरसता भी आती है औरत को इस बात पर फख्र होना चाहिये वह परिवार की धुरी है. किंतु नारी वादियो के चक्कर मे आज स्थिति बिगाड की ओर है.

प्रतुल वशिष्ठ said...

दिव्या जी, आपके विचार 'राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य' में ही व्यक्त होते हैं... सत्य सूचनाओं के आधार पर बने विचार और जग जाहिर सुपर-डुपर गोपनीय देवी का आचरण जानने के बाद कोई भी आक्रोश से भर जायेगा.
उसपर दिवस जी का समर्थन पाना दो राष्ट्रवादी सोच का एकाकार होना ही है. जब सभी राष्ट्र-प्रेमी एक मंच पर एकत्र होते हैं... मन आह्लादित हो जाता है.

दिवस जी, इतना कहना चाहूँगा.... 'नारी' शब्द 'नर' शब्द का स्त्रीवाची शब्द है 'नर' शब्द का निर्माण 'नृत्' धातु से हुआ ... और 'नृत्' से ही क्यों हुआ? ... क्योंकि वह अपने भावों और विचारों को नर्तन (अर्थात 'आंगिक संचालन') से व्यक्त कर पाता है. बिना आंगिक हरकतों से वह सम्पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं कर सकता. .......... ये बात मेरे आचार्य ने मुझे बतायी थी. इसी तरह 'स्त्री' शब्द की निर्मिती के बारे में आप किसी संस्कृत व्याकरणाचार्य से अवश्य विमर्श करियेगा. 'स्त्री' संबंध की अधूरी कल्पित जानकारी आपको नहीं देना चाहता.

Prabodh Kumar Govil said...

"wad"ke daayre men santulit nahin socha ja sakta, nishpakshta bachaane ke liye aapka sochna sahi hai!

expression said...

i'm with you divya......
you fight intelligently....
bless u.
anu

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

हे राम !




surenderpal vaidya said...

आपके देशभक्तिपूर्ण और स्पष्टवादी विचार प्रशंसनीय हैँ । देश में जातिवाद, क्षेत्रवाद, अल्पसंख्यकवाद, छुआछूत आदि की तरह नारीवाद भी एक समस्या बनती जा रही है । इसकी आड़ मेँ स्वार्थ की घटिया राजनीति की जा रही है ।

Virendra Kumar Sharma said...

मोहन खूब नचायो ,रमैया इटली जी ,

बहुत ही फाग रचायो .रमैया इटली जी ,

टूटे सब लय ताल देश के ,टूटे सबद -रसाल रमैया इटली जी ,

भारत अब बे -हाल ,रमैया इटली जी !

कुछ तो करो इलाज़ रमैया इटली जी .

ममता हो गई बाहर री -मैया -इटलीजी .

देश हुआ बे -हाल री -मैया -इटली- जी ,
अब तो करो मुहाल री -मैया इटली -जी .

हिंदी करे प्रणाम री मैया इटली जी .

Virendra Kumar Sharma said...

नारीवादियों अपना

यह वही योरपीय महिला है जिसके नाम से इंदिराजी जी ने स्विस बैंक में खाता खोला था .इंदिराजी आखिर व्यवहार कुशला थीं .उन्होंने कभी नहीं कहा मैं क्लीन हूँ .जो कहा सब जानतें हैं और अच्छी तरह से मानते हैं कि भ्रष्टाचार इक आलमी रवायत है ग्लोबल फिनोमिना है .फिर आये मिस्टर क्लीन और ये हैं मिसेज़ क्लीन सोनिया मायनों .......खाते के चौकीदार अब बाबा राहुल हैं भारत के कथित भावी प्रधान मंत्री (जिस किसी को संदेह हो मूल दस्तावेज़ मेरे ब्लॉग आर्काइव्ज़ में आके देख सकता है अलबता मेहनत ज़रूर करनी पड़ेगी पौने पांच हजार पोस्ट खंगाल ने पड़ेंगे राम राम भाई पर ,गत वर्ष पूरी श्रृंखला की थी अमरीका प्रवास के दौरान स्विस बैंक के कोंग्रेसी खातों की ) .राशि है ४९२ अरब डॉलर (यह फिगर पिछले साल का है अब तो और फूल गया होगा ).

किसी ने आज तक इस षड्यंत्र कारी महिला को हंसते मुस्काते देखा है (अपवाद छोड़ दीजिए ,एक फोटो हम भी दिखा सकते हैं इनका हँसते हुए का ) ,हर आदमी को एक सौ रुपया इनाम देने को तैयार हूँ .

ये वही महिला है जो हुश हुश करके संसद में कुत्ते लडवाती है .कोंग्रेसी हरेक संसद को इशारों इशारों में भड़काती है .मोहन को नांच नचाती है .कसरत उससे करवाती है .पूडल उसको कहल -वाती है .फिर भी विश्व -की सशक्त महिला कहलाती है .भाई साहब इतना भी नहीं समझते -चर्च ने इसे भारत की राजनीतिक काया पे रोपा है .बॉडी पोलीटिक पे इम्प्लांट किया है .इसकी क्या आरती उतारी जाए .देव प्रतिमा बना मंदिर में प्रतिष्ठापित किया जाए ?

रविकर फैजाबादी said...

उत्कृष्ट प्रस्तुति आज बुधवार के चर्चा मंच पर ।।