Tuesday, September 14, 2010

काया में स्थित कायस्थ --वेदान्त केसरी-- स्वामी विवेकानंद !

ब्रम्हा जी ने जब सिष्टि की रचना की तो उनके सर से ब्रह्मण , भुजाओं से क्षत्रिय , जंघा से वैश्य तथा पैर के तलवों से शुद्र पैदा हुएइस प्रकार ये चार वर्ण बनेब्रम्हा जी ने धर्मराज को कार्य सौंपा की तीनों लोकों में जितने भी जीव हैं उनके जन्म-मृत्यु, पाप-पुण्य, मोक्ष आदि का पूरा लेखा जोखा रखो धर्मराज कुछ समय के बाद परेशान होकर ब्रम्हा के पास गए और बोले- " प्रभु, चौरासी लाख योनियों के जीवों के पाप पुण्य के लेखा-जोखा मुझसे अकेले नहीं होता, मेरी समस्या का समाधान कीजियेउनकी बात सुन ब्रम्हा जी चिंता में पड़ गएउनकी इस अवस्था को देख, ब्रम्हा जी की काया से एक पुरुष कलम-दवात लेकर उनके समक्ष प्रकट हुआकाया से प्रकट होने के कारण उन्हें कायस्थ कहा गयाउनका नाम चित्रगुप्त हुआ। मनु स्मृति के अनुसार ब्रम्हा जी ने चित्रगुप्त महाराज को धर्मराज के साथ यमलोक में पाप-पुण्य कर्मों के अनुसार मोक्ष आदि के निर्धारण का कार्य सौंपा। इसीलिए कायस्थ लोग पारंपरिक तौर पर लेखांकन [ अकाऊंटिंग ], तथा साहित्यिक गतिविधियों से ज्यादा जुड़े हुए होते हैं। कलम के धनी कायस्थ लोग दीपाली के तीसरे दिन कलम-दवात की पूजा करते हैं।

पद्म पुराण तथा भविष्य पुराण के अनुसार , चित्रगुप्त महाराज की दो पत्नियों से बारह संतानें हुई । पहली पत्नी शोभावती / इरावती [ ऋषि शिव शर्मा की पुत्री ] से भटनागर, माथुर, सक्सेना , श्रीवास्तव तथा दूसरी पत्नी माता नंदिनी [ सूर्य पुत्र -आदि मनु की पुत्री ] से अम्बष्ट , अष्ठाना ,निगम , वाल्मीकि, गौड़, कर्ण , कुलश्रेष्ठ , एवं सुरजद्वाज नामक आठ संतानें पैदा हुईं।

कायस्थों की बारह उपजातियां जब भारत के विभिन्न प्रान्तों में फैलने लगे , तो उन्होंने कुछ स्थानीय नाम अपना लिए। जैसे बिहार के कर्ण कायस्थ, आसाम के बरुआ, उड़ीसा के पटनायक और सैकिया , पश्चिम बंगाल के बोस , बासु, मित्रा , घोष, सेन, सान्याल तथा महाराष्ट्र में प्रभु। कुछ लोग लाल, प्रसाद, दयाल तथा नारायण भी लिखने लगे।

आइये मिलते हैं , देश की कुछ गौरवशाली ' कायस्थ ' हस्तियों से --

१- स्वामी विवेकानंद -
  • स्वामी विवेकनद speaking on the status of Kayasthas said:
  • “I am the descendant of that great man at whose feet every Brahmin bows his head।”
१२ जनवरी 1863 को जन्मे नरेन्द्रनाथ दत्त [ विवेकानंद], रामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे । स्वामी विवेकानंद ने विलुप्त होते हिन्दू धर्म को बचाया तथा पश्चिम में भी इसका प्रचार-प्रसार किया। इन्होने वेदान्त, योग तथा विज्ञान को भी उचाईयों तक पहुँचाया।

-१९ सितम्बर १८९३ को शिकागो की धर्म-संसद में अपना पहला अध्यात्मिक भाषण दिया। भाषण की शुरुआत इन्होने " सिस्टर्स एंड ब्रदर्स आफ अमेरिका " से की। इससे प्रभावित होकर वहाँ पर उपस्थित ७००० लोगों की भीड़ ने उन्हें स्टैंडिंग-ओवेशन दिया। न्यू योर्क हेराल्ड ने लिखा-......" Vivekananda is undoubtedly the greatest figure in the parliament of religion. After hearing him we feel how foolish it is to send missionaries to this learned nation . "

-१८९७ में इन्होने 'रामकृष्ण मठ तथा रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। अल्मोड़ा के निकट अद्वैत आश्रम की स्थापना की। इन्होने 'प्रबुद्ध भारत ' [अंग्रजी ] तथा 'उद्बोधन' [बंगाली ] पत्रिकाओं की शुरुआत की ।

-भारत के प्रथम गवर्नर जनरल , चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने लिखा की - " विवेकानंद ने हिंदुत्व तथा राष्ट्र को बचाया "
सुभाष चन्द्र बोस ने कहा की " Vivekananda is the maker of modern India "
गाँधी जी ने कहा-" Vivekananda's writings need no introduction from anybody. They make their own irresistible appeal. "

अरबिंदो घोष ने उन्हें अपना अध्यात्मिक गुरु माना।

रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा- " If you want to know India- Read Vivekananda. "

Nobel Laureate Romain Rolland wrote- " His words are great music , phrases in the style of Beethoven, stirring rhythms like the march of Handel choruses."

बहुत से शैक्षणिक संस्थानों ने विवेकानंदा के नाम को अपनाया -
१-IIT Madras - Vivekananda study circle.
२-IIT Kanpur- Vivekananda Samiti.

११ नवम्बर १९९५ में शिकागो में मिशिगन अवेन्यु नामक सड़क-मार्ग का नाम ' स्वामी विवेकानंदा वे ' रखा गया।

स्वामी विवेकनद के पुण्य-स्मरण में १२ जनवरी , उनके जन्म-दिन पर ' नॅशनल यूथ डे ' मनाते हैं। जो हमारी युवा पीढ़ी को , अपनी प्राचीन संस्कृति को बनाए रखने के लिए प्रेरित करता है।

विवेकनद एक बहुत बड़े कवी तथा गायक भी थे। इन्होने मृत्यु से पूर्व '....काली डा मदर ' को राग-बद्ध किया।

२- डॉ राजेन्द्र प्रसाद -
-भारत के प्रथम राष्ट्रपति का जन्म , बिहार के जिला सीवान में ३ जनवरी १८८४ को हुआ था। इनके पिता नाम महादेव सहाय तथा माता का नाम कमलेश्वरी देवी था।
-ये भारत के एक मात्र ऐसे प्रेसिडेंट थे जो अपनी तनख्वाह का चौथाई हिस्सा , संस्कृत के विद्यार्थियों को दे देते थे।
-विद्या के धनी डॉ राजेन्द्र प्रसाद गोल्ड मेडलिस्ट थे । परीक्षा में कहा जाता था-' अटेम्प्ट ऐनी फाइव '....राजेंद्र प्रसाद सभी प्रश्न हल करके लिख देते थे - " चेक ऐनी फाइव '
- भारत का पहला संविधान १९४८-१९५० , डॉ राजेंद्र प्रसाद ने बनाया था।
-इन्हें भारत के सर्वोच्च पुरस्कार 'भारत-रत्न ' से पुरस्कृत किया गया।

आजादी के बाद , गांधी जी ने राजेन्द्र प्रसाद को प्रधान मंत्री बनाना चाह तो इन्होने अस्वीकार कर दिया और नेहरु को बनाने के लिए कहा। फिर गांधी जी ने इन्हें राष्ट्रपति बनाना चाह तो इन्होने अस्वीकार करते हुए कहा की- " मैं कर्ज में डूबा हुआ हूँ और मैं नहीं चाहता की आजाद भारत का पहला प्रेसिडेंट कर्जदार हो। तब गाँधी जी ने जमुना लाल बजाज को बुलाकर इनको कर्ज-मुक्त कराया और तब ये राष्ट्रपति बने।

नेहरु जी द्वारा प्रस्तुत - ' हिन्दू कोड बिल ' को जब डॉ राजेंद्र प्रसाद के सामने लाया गया तो उन्होंने उसे अस्वीकार कर दिया, काट-छाँटके बाद दुबारा लाया गया तो पुनः आपति जाहिर की, तीसरी बार में जाकर वह बिल पास` हुआ । तब तक उसका दो-तिहाई हिस्सा हटाया जा चूका था। यदि वो बिल उस समय पूरा पास हो जाता तो भारत का नैतिक मूल्य जो आज आजादी के साठ साल बाद गिरा है, वो तभी गिर चुका होता।

उस बिल पर डॉ राजेन्द्र प्रसाद को सख्त आपत्ति थी। उन्होंने लिखा है -- [" Had there been any clause of referendum in the constitution of India, the electorate would have decided the question. "]

यानि, यदि यह संवैधानिक अधिकार जनता के पास होता तो यह बिल कभी पास नहीं होता।


३- लाल बहादुर शास्त्री -

-भारत के दुसरे प्रधानमंत्री , लाल बहादुर शाष्त्री का जन्म , मुगलसराय -वाराणसी में हुआ। इनके पिता का नाम श्री शारदा श्रीवास्तव तथा माता का नाम रामदुलारी था।
- इन्हें पढ़ाई से बहुत लगाव था, किन्तु बहुत गरीब होने के कारण , नदी तैरकर पार करते थे तथा विद्यालय जाते थे।
- इनहें जाती व्यवस्था से बहुत चिढ थी , इसलिए इन्होने अपने नाम से श्रीवास्तव हटाकर 'शास्त्री ' रख लिया।
- इन्होने हरिजनों के उत्थान के लिए बहुत कार्य किये।
- इनकी मृत्यु संदिग्ध परिस्थितियों में ताश्केंटमें, १० जनवरी १९६६ में हुई।
- इन्हें मृत्युपरांत, भारत रत्न पुरूस्कार भी मिला।


४- लोकनायक जय प्रकाश नारायण--

-इस स्वतंत्रता सेनानी का जन्म बिहार के छपरा जिले में , ११ अक्टूबर १९०२ को हुआ।
-मृत्युपरांत इनहें भारत रत्न से पुरस्कृत किया गया।
-इसके अतिरिक्त इनहें मग्सेसे पुरस्कार भी मिला।
-पटना में इनके नाम पर जय प्रकाश नारायण एअरपोर्ट भी है।
- इन्होने 'सर्वोदय आन्दोलन' में अपनी सारी सम्पति दान कर दी तथा हरिजनों के उत्थान के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।
-इन्होने विनम्रता से राष्ट्रपति पद का आफ़र ठुकरा दिया था।


५-जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा-

-बेहद इमानदार और निर्भीक व्यक्तित्व के थे।
-इलाहाबाद हाई-कोर्ट में १२ जून १९७५ को अपने एक फैसले में इन्होने , इंदिरा गाँधी के गलत तरीके से चुनाव प्रसार करने के कारण , उन पर छेह वर्ष का प्रतिबन्ध लगा दिया था, तथा प्रधान मंत्री को पंद्रह दिन की जेल करा दी थी। इंदिरा गांधी ने प्रतिशोध के चलते २५ जून १९७५ से लेकर १९७७ तक आपातकाल घोषित कर दिया था। लेकिन उसके बाद चुनाव होने पर इंदिरा गांधी की दाल नहीं गली और वे चुनाव हार गयीं।


६- डॉ सम्पूर्णानन्द -

-१ जनवरी को बनारस में जन्मे डॉ सम्पूर्णानन्द को संस्कृत तथा फलित ज्योतिष में बहुत रूचि थी।
-उत्तर प्रदेश के शिक्षा मंत्री तथा राजस्थान के गवर्नर रह चुके डॉ सम्पूर्णानन्द ने बनारस में संस्कृत विश्विद्यालय की स्थापना की।
-उनका मानना था की कैदियों को रिफार्म किया जाना चाहिए । इसके लिए १९६३ में राजस्थान की सरकार ने ' सम्पूर्णानन्द खुलाबंदी शिविर ' [ओपन जेल ] की शुरुआत की।


७-नेताजी सुभाष चन्द्र बोस-The forgotten hero.

-जन्म-२३ जुलाई १८९७।
-' तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा '- उनका नारा था।
- पूर्ण स्वराज उनका ध्येय था ।
-प्रतिभाशाली सुभाष चन्द्र बोस ने आई सी एस की परीक्षा में टॉप कर अच्छी नौकरी हासिल की, लेकिन देश की खातिर , विदेशियों के अधीन नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया।
- ६ जुलाई १९४४ में सिंगापोर से जब उनका भाषण प्रसारित हुआ तो उन्होंने ही बापू को पहली बार " फादर ऑफ़ था नेशन ' कहा।
-इनके प्रसिद्ध कोट हैं - 'दिल्ली चलो' , ' ऑन टू डेल्ही ' , 'जय-हिंद' तथा 'ग्लोरी ऑफ़ इंडिया '
- जय-हिंद नारे को भारत सरकार तथा आर्मी ने अपना लिया।
-इन्होने आजाद हिंद फ़ौज की स्थापना की तथा इनकी कुर्सी रेड फोर्ट में रखी है जो आज हमारी सांस्कृतिक धरोहर है।


८- हरिवंश राय बच्चन -

-रानीगंज, प्रतापगढ़ , उत्तर प्रदेश में जन्मे हरिवंश राय बच्चन के पिता का नाम प्रताप नारायण श्रीवास्तव तथा माता का नाम सरस्वती देवी था।
- ये कम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के दुसरे भारतीय थे जिन्हें , अंग्रेजी में डाक्ट्रेटकी उपाधि मिली।
- इनहें -
-साहित्य अकादमी पुरस्कार [१९६९]
-पद्म भूषण [१९७६]
-सरस्वती सम्मान
-यश भारती सम्मान
-सोवियत लैंड नेहरु पुरस्कार
-लोटस अवार्ड फॉर अफरो एशियन राईटर्स , आदि मिले।

- इनकी प्रचलित कविता ' अग्निपथ ' के अंश--

अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ! वृक्ष हों भले खड़े, हो घने, हो बड़े, एक पत्र-छॉंह भी मॉंग मत, मॉंग मत, मॉंग मत! अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ! तू थकेगा कभी! तू थमेगा कभी! तू मुड़ेगा कभी! कर शपथ! कर शपथ! कर शपथ! ये महान दृश्य है, चल रहा मनुष्य है, अश्रु श्वेत् रक्त से, लथ पथ, लथ पथ, लथ पथ ! अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

-महर्षि शिव ब्रत लाल वर्मा -

इनका जन्म १८०७ में उत्तर प्रदेश के भदोही जिले में हुआ था। इन्होने अपने जीवन काल में हिंदी, अंग्रेजी तथा उर्दू में ५००० से अधिक पुस्तकें इतिहास , धर्म तथा अध्यात्म पर लिखीं । इन्हें आधुनिक महर्षि वेद व्यास के नाम से भी जाना जाता है। इन्होने १९०७ में 'साधू' नामक पत्रिका शुरू की जो बहुत लोकप्रिय रही। सन १९३९ में इस महान हस्ती का निधन हो गया। इनकी कुछ प्रचलित पुस्तकें इस प्रकार हैं --

  • 1) Light of Anand Yoga (English)
  • 2) Dayal Yoga
  • 3) Shabd Yoga
  • 4) Radhaswami Yog: Part 1-6
  • 5) Radhaswami Mat Parkash
  • 6) Adbhut Upasana Yog: Part 1-2
  • 7) Anmol Vichar
  • 8) Dus Avtaron Ki Katha
  • 9) Kabir Prichaya Adyagyan
  • 10) Kabir Yog: Part 1-13
  • 11) Kabir Bijak: Part 1-3
  • --------------------------------------------------------

  • कुछ महान कायस्थ हस्तियां जिन पर हमें गर्व है :
    स्वामी विवेकानंद
    सर अरबिंदो
    महर्षि महर्षि महेश योगी
    प्रभुपाद
    डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद
    लाल बहादुर शास्त्री
    सुभाष चन्द्र बॉस
    जय प्रकाश नारायण
    जस्टिस सिन्हा
    बाला साहब ठाकरे
    हरिवंश राय बच्चन
    मुंशी प्रेमचन्द्र
    महादेवी वर्मा
    फिराक गोरखपुरी
    डाक्टर सम्पूर्णानंद
    डाक्टर शांति स्वरुप भटनागर
    डाक्टर जगदीश चन्द्र बॉस
    भगवती चरण वर्मा
    धर्मवीर भारती
    फणीश्वर नाथ रेणू
    मन्ना डे
    मुकेश (गायक)
    गणेश शंकर विद्यार्थी
    बिपिन चन्द्र पाल
    सुभाष चन्द्र बोस
    खुदीराम बोस
    आदि ...

तो आज हमारा परिचय महाराज चित्रगुप्त की कुछ होनहार संतानों से हुआ। 

आभार
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111 comments:

ZEAL said...

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भारत प्रवास के दौरान , पिताजी के साथ जाती आधारित जनगणना की चर्चा में प्रसंगवश कायस्थ चर्चा इस पोस्ट में हैं। स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया , के रिटायर्ड अधिकारी , श्री वेद प्रकाश श्रीवास्तव [मेरे पिताजी] को समर्पित है यह पोस्ट।
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हमारीवाणी.कॉम said...

क्या आप ब्लॉग संकलक हमारीवाणी के सदस्य हैं?

हमारीवाणी पर ब्लॉग पंजीकृत करने की विधि

पंकज मिश्रा said...

bahoot sundar, badhai aapko

Pratul said...

प्रारंभ में ब्राह्मणों का कार्य अध्ययन-अध्यापन हुआ करता था. कालान्तर में आजीविका के लिये जो ब्राह्मण राज-कार्यों अथवा प्रशासनिक सेवाओं में कार्यस्थ हो गये वे सभी कायस्थ कहलाये.
मूल स्वभाव नहीं बदला. या तो उन्होंने मुंशीगिरी की, यथा मुंशी धनपत राय [प्रेमचंद], या वे लिपिक हो गये, राजा और नवाबों के यहाँ लिखत-पढ़त करने वाली तरह-तरह की नौकरियाँ कर लीं.
जितनी साहित्य की सेवा कार्यस्थों ने की है उतनी सेवा स्यात ही किसी साहित्य समीपस्थों ने की हो. महादेवी वर्मा, वृन्दावनलाल वर्मा, निर्मल वर्मा, भगवतीचरण वर्मा, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, हरिवंश राय आदि-आदि .... साहित्य की प्रत्येक विधा में ऊँचा लेखन मिल जाएगा यहाँ.

boletobindas said...

अच्छी जानकारी। राजेंद्र बाबू के बारे में एक बात और है। वो राष्ट्रपति नहीं बनना चाहते थे। पर गांधी जी ने कहा कि कोई तो हो जिसे जहर पीना चाहिए। तब उनकी बात मान और नेहरु के न चाहने पर भी वो राष्ट्पति बने। यही नहीं नेहरु के न चाहने पर भी दोबार लड़कर जीते करीब 96 प्रतिशत मतों से जो आज तक रिकॉर्ड है। उनके राज्य बिहार से सौ फीसदी के लगभम मत। और दूसरी पार्टियों से समर्थन। इस बराबरी पर कोई भी टिक नहीं पाएगा।


मगर एक बात अजीब लगी। स्वामी विवेकानंद और नेताजी की जाति का आज ही पता चला मुझे। कभी जाति जानने की जरुरत महसूस नहीं हुई। मेरे ख्याल से ये सभी लोग सच्चे भारतीय थे।

उन्मुक्त said...

मैंने हरिवंश राय बच्चन की लिखी आत्म जीवनी की चारों पुस्तकों की समीक्षा की है। वे अपनी पहली पुस्तक क्या भूलूं क्या याद करूं में लिखते हैं,
‘कायस्थ के वाक-चातुर्य और बुद्धि-कौशल के भी किस्से कहे जाते हैं। हमारे एक अध्यापक पंडित जी कहा करते थे कि कायस्थ की मुई खोपड़ी भी बोलती है। उन्हीं से मैंने सुना था कि एक बार किसी ने देवी की बड़ी आराधना की। देवी ने प्रसन्न होकर एक वरदान देने को कहा। इधर मां अं‍धी, पत्नी की कोख सूनी, घर में गरीबी। बडे असमंजस में पड़ा-मां के लिए आंख मांगे, कि पत्नी के लिए पुत्र, कि परिवार के लिए धन। जब सोच-सोचकर हार गया तो एक कायस्थ महोदय के पास पहूंचा। उन्होंने कहा,“इसमें परेशान होने की क्या बात है, तुम कहो कि मैं यह मॉगता हूं कि मेरी मां अपने पोते को रोज सोने की कटोरी में दूध-भात खाते देखें !’
:-)

ethereal_infinia said...

Dearest ZEAL:

Nice informative writing.

Good compilation.


Arth Desai

[under strongest protest against 'moderation']

ZEAL said...

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@ Arth Desai-

you have shown your protest against moderation, which is already addressed on my last post.
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ashish said...

बढ़िया परिचर्चा , चित्रगुप्त परिवार के बारे में बहुत सारी जानकारिया मिली .डॉ राजेंद्र प्रसाद और नेताजी तो हमारे समाज के रत्न है . वैसे मैंने एक बार राजेंद्र प्रसाद के मेघा के बारे में सुना था की , उनकी उत्तर पुस्तिका पर परीक्षक ने लिखा था" examinee is better than examiner .

ZEAL said...

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@ अरविन्द मिश्र-

आपका कमेन्ट पब्लिश न करने का खेद है। आपने इस ब्लॉग को भड़ास निकालने का स्थान समझा है इसलिए। व्यक्तिगत दुश्मनी किसी की पोस्ट पर जाकर मत निकला कीजिये। आप जैसे लोगों की अभद्र टिप्पणियों से बचने के लिए ही मोडरेशन लगाना पड़ा है।

आपने लिखा की ये पोस्ट जातिवाद को बढ़ावा देती है ....उत्तर है..." जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत तिन देखि तैसी।

मैंने ये पोस्ट लोगों की जानकारी हेतु लिखी है। बहुत बार मैंने कायस्थ का इतिहास जानना चाह तो नेट पर उतनी जानकारी उपलब्ध नहीं थी । न ही घर परिवार को इतना मालूम होता है । इसलिए जब प्रसंगवश पिताजी से ये जानकारी हासिल हुई तो सोचा की अपने मित्रों और पाठकों के साथ भी यह जानकारी शेयर करूँ। अपने गौरवशाली इतिहास को जानने में भला क्या आपति हो सकती है ?

मुझे लगा हिंदी में भी जानकारी होनी चाहिए इन् सभी विषयों पर, इसलिए लिखा । इस पोस्ट पर की गयी
मेहनत और इसकी उपयोगिता को कोई विरला ही समझेगा। सभी से आशा भी नहीं रखती।

आप तो विद्वान हैं, आपने और आपके मित्र गिरिजेश ने मुझे कटही कुतिया और सूपर्णखा कहा , आपसे इससे ज्यादा और क्या उम्मीद रख सकती हूँ। पहले स्त्रियों का सम्मान करना सीखिए फिर उपदेश दीजियेगा।

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ZEAL said...

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@ अरविन्द मिश्र-

वो भारतीय नहीं जिसको अपने देश पर गर्व न हो।
वो स्त्री नहीं जिसको अपने स्त्रीत्व पर गर्व न हो।
वो चिकित्सक नहीं खुद को गौरवान्वित न महसूस करे।
वो कायस्थ नहीं , जो आप जैसों को सुधार के न रख दे।

अरविन्द मिश्र मेरी राय में आप 'एक आस्तीन के सांप' हैं , कृपया मुझसे दूर रहे।

नोट- 'आस्तीन का सांप' गाली नहीं है, यह एक मुहावरा है जो आपके व्यक्तित्व को चंद शब्दों में बयान करता है।

आभार।

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ZEAL said...

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Attention -

Readers are requested to read and enjoy the post. The information shared is to enrich our Hindi text.

It's not necessary to comment after reading.

Thanks.

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राकेश कौशिक said...

ज्ञानवर्धक प्रस्तुति के लिए धन्यवाद्

shailendra said...

fresh post.......

kuch jankariyan pahli baar mil rahi hai aapke sojanya se.....

book mark......

pratulji ki pati....evam ....unmuktji ke ukti...
achhi lagi....

bahut khubsurat post hai....iski disha na badlen.....

hira bahut mulyvan hota hai lekin use khaya nahi jata......

pranam.

G Vishwanath said...

Divya,

I just read your post.
I found it informative and useful.
I learned new facts and also confirmed some old knowledge.
I did not know Lal Bahadur was a Kaayastha.
In the south Shastri's are Brahmans
I had a few very good Kaayastha friends during my student days in Pilani and later at Roorkee.
That was during my youth (1967 to 1974).
I had observed that they were excellent at Urdu and I used to admire their ability to talk in fluent and flowery Urdu while compering variety entertainment programs in college. They also used to entertain us at the Mess dining table with some really great shaayaries.
I gradually learned some Urdu from them.

I later learned that most Kaayasthas were specially good at Urdu.
I am curious to know the circumstances under which this probably happened.

You will be glad to know that my address in Bangalore is JP Nagar.
This stands for Jayprakash Narayan Nagar. Our old name for this area was Saaraki.
It was renamed after JP soon after the 1977 euphoria when the Janata Party swept the polls and unseated Indira Gandhi.

I was amused by Babu Rajendra Prasad's attempting all questions and asking the examiner to check any five!
Actually I once did something similar myself when I was a student at BITS Pilani.
The occasion was an internal test. We were aksed to attempt any three from five.
I attempted all five and asked the examiner to consider the "best three"
The result was rather discouraging.
The examiner wrote "I will check only the first three. Not the best three.
We are not paid to do more work than needed. Who has that much time? Don't try to be oversmart!"


You did not mention the most famous Kaayastha in the world today?
I am referring to The Big B. Amithabh Bacchan.

A minor error may please be corrected.
You have written "IIT Madras - Vivekananda Steady circle.
It should be Study circle, not steady circle.

Lastly, let my reconfirm my advice to you to retain moderation.
This blog definitely needs it.
Politely and respectfully disagree with some of your readers who are protesting against it.
Request them to understand the special situation in your case and plead with them to accept this minor inconvenience.
If they still don't accept your decision and decide not to comment, or visit your blog, that would be unfortunate
You must face the fact that others also have a right to their preferences on this issue.
In case there is no agreement or compromise, then a friendly parting of ways is the only way out.
There need not be any unpleasantness over this issue.

Before closing my comment let me assure you that I do not see your post as casteist in any way.
You have given factual information about a prominent North Indian community without reflecting any prejudices and have not said a word against any other caste group.
Being proud of one's identity without demeaning others is a good and healthy attitude and you need not defend this policy before any one.

Regards and best wishes.
G Vishwanath,
JP Nagar, Bangalore

Vijai Mathur said...

दिव्या जी,
सम्पूर्णा नन्द जी उत्तर प्रदेश के मुख्य मन्त्री भी पन्त जी के बाद बने थे.
कायस्थ के सम्बन्ध मे पौराणिक आधार पर आपने लिखा प्रचलन मे यही है.परन्तु वास्तविकता यह है कि सृष्टि के आरम्भ मे पिछ्ली सृष्टि से मोक्ष प्राप्त आत्माओं ने इस सृष्टि कि मानव जाति को जो शिक्षा दीक्षा दी जिस मे सभी कुछ आता है और काया (शरीर)से सम्बन्धित सारी बातें-ज्ञान विज्ञान ,स्वास्थ्य, रक्षा ,शिक्षा आदि आदि.देने का कार्य जो विद्वान करते थे उन्हें कायस्थ कहाँ जाता था.आप के चिकित्सालयों मे मेडिसिन विभाग को आज भी काय चिकित्सा विभाग कहते है.इसी प्रकार मनुष्य की काया से सम्बन्धित समस्त शिक्षा देने वाले कायस्थ हुए.जब आवादी बढी तो कार्य विभाजन हुआ-ब्रह्म ज्ञान से सम्बन्धित शिक्षा देने वाले ब्राह्मण,रक्षा से सम्बन्धित शिक्षक क्षत्रिय,व्यवसाय -वाणिज्य से सम्बन्धित शिक्षक वैश्य और सेवओं से सम्बन्धित शिक्षक शूद्र कहलाए.ये उपाधियाँ (डिग्री) थी.जैसे लाल बहादुर जी ने शास्त्री डिग्री को अपने नाम के आगे लगाया उसी प्रकार तब भी छात्र पास होने के बाद अपने नाम के आगे अपनी डिग्रीयाँ लहते थे जो योग्यता के आधार पर थी जन्म पर नही.जैसे डाक्टर की सन्तान इन्जिनियर हो सकती है और वकील की सन्तान सैन्य अधिकारि हो सकती है-अपनी अपनी योग्यता पर निर्भर करता है.
इस शरीर के साथ् सूक्ष्म और कारण शरीर भी होते हैं जो मोक्ष की गति तक आत्मा के साथ् चलते हैं उन के द्वारा मनुष्यों के कार्यों का लेखा जोखा मन-,मस्तिष्क पर गुप्त रुप से अङ्कित हो जाता है,वही चित्रगुप्त है.और १२ रशियों के आधार पर १२ काय्स्थों का का निर्धारण हुआ है.ज्योतिष मे तर्ज्नी उन्गली(गुरु या बृहस्पत) ब्राह्मण का प्रतीक है,मध्यमा(शनि)या शूद्र,अनामिका (सूर्य)क्षत्रिय का,कनिष्ठिका(बुध)वैश्य का.अन्गूठा (शुक्र)कायस्थ का प्रतीक है.ये ५ ग्रह ही मूल ग्रह हैं,चन्द्र मंगल पृथ्वी के उपग्रह हैं और राहु केतु उत्तरी व दक्षिणी ध्रुव हैं.मुट्ठी बन्द करने पर अन्गूठा ऊपर होता है अतः कायस्थ चारों वर्नों से ऊपर हैं.अफसोस है काय्स्थों ने इस सत्य को भुला दिया है

रंजन said...

अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ! वृक्ष हों भले खड़े, हो घने, हो बड़े, एक पत्र-छॉंह भी मॉंग मत, मॉंग मत, मॉंग मत! अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ! तू न थकेगा कभी! तू न थमेगा कभी! तू न मुड़ेगा कभी! कर शपथ! कर शपथ! कर शपथ! ये महान दृश्य है, चल रहा मनुष्य है, अश्रु श्वेत् रक्त से, लथ पथ, लथ पथ, लथ पथ ! अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

ये ही कामना है आपके लिए...

anoop joshi said...

अच्छी जानकारी।
me to kahata hu is tarike se aap naye dhang se jaatiwaad riservation ki sathik jaankaari le sakte hain......

arvind said...

bahut ho gyanvardhak,jankari se bharaa huaa post.... comment me ek jagah aapane likha hai...जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत तिन देखि तैसी।...yeh bahut satik baithata hai unke liye jo is jaati ko badhaavaa dena samajhte hain...

P S Bhakuni (Paanu) said...

............नेहरु जी द्वारा प्रस्तुत - ' हिन्दू कोड बिल ' को जब डॉ राजेंद्र प्रसाद के सामने लाया गया तो उन्होंने उसे अस्वीकार कर दिया, काट-छाँटके बाद दुबारा लाया गया तो पुनः आपति जाहिर की, तीसरी बार में जाकर वह बिल पास` हुआ । तब तक उसका दो-तिहाई हिस्सा हटाया जा चूका था। यदि वो बिल उस समय पूरा पास हो जाता तो भारत का नैतिक मूल्य जो आज आजादी के साठ साल बाद गिरा है, वो तभी गिर चुका होता।.


ज्ञानवर्धक प्रस्तुति के लिए धन्यवाद्

शिक्षामित्र said...

वृहद् और रूचिकर जानकारी।

कुमार राधारमण said...

अच्छी बात यह है कि इन सबने अपनी जाति से कहीं ऊपर उठकर,राष्ट्र,साहित्य और मानवता के लिए बहुत कुछ किया।

cmpershad said...

दक्षिण में भी कई लब्धप्रतिष्ठित कायस्थ - श्रिवास्तव, माथुर, सक्सेना, अस्थाना आदि हुए है। सूचनार्थ॥ आशा है इस लेख से प्रेरित होकर संपूर्ण जाति का विवरण एक सूत्र में बंध जाएगा॥

RAJAN said...

Behad jaankariparak aalekh.shukriya.

ZEAL said...

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विश्वनाथ जी,
भूल सुधार कर लिया है, आभार। मुझे बहुत ख़ुशी है की आपने मेरी पोस्ट इतने ध्यान से पढ़ी।

पाठकों ने अपने विचारों को यहाँ रखकर , पोस्ट की सार्थकता बढ़ा दी है। आपकी टिप्पणियों से मेरा भी ज्ञानवर्धन हो रहा है, इसके लिए आप सभी का आभार।
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RAJAN said...

main rajasthan ka niwasi, ek rajput yuvak hun.kal yadi main apne blog par rajasthani rapooton ke gauravshali ateet ke baare me batau to kya iska matlab ye hai ki main jaativaad ya kshetrawaad ko badhawa de raha hun?nahi kyoki maine kisi aur jaati ki aalochna nahi ki hai......aap kripya aaropo se vichlit na ho aur apne kaam me man lagaye.shubhkaamnaye.

shailendra said...

@VIJAY MATHUR

THANX FOR YOUR.....COMMENT

honesty project democracy said...

अच्छी बात यह है कि इन सबने अपनी जाति से कहीं ऊपर उठकर,राष्ट्र,साहित्य और मानवता के लिए बहुत कुछ किया ... बहुत ही सुन्दर बात कही है राधारमण जी ने आप भी इस पोस्ट को जातिगत दायरे में नहीं समेटते तो इस पोस्ट में चार चाँद और लग जाता ,वैसे अभी भी एक अच्छी पोस्ट है ये ...आगे हो सके तो जात-पात को किसी भी हालत में चर्चा का विषय बनने से रोकने का प्रयास करें ...

ZEAL said...

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@--honesty project democracy -

आपको यह पोस्ट यदि जात पात वाली लगती है तो बेहद खेद है आपकी समझ पर। इस पोस्ट में अपने समाज , अपने वंश, अपनी संस्कृति और वैदिक अवतरण की चर्चा की गयी है। दुर्लभ जानकारियों को समेटा गया है। गर्व होता है इन श्रेष्ठ महापुरुषों को जानकार। मुझे अफ़सोस था की अब तक क्यूँ नहीं इनके बारे में जाना। लेकिन जब जानकारी हुई तो अविलम्ब आप सबके साथ साझा की । शायद लोगों ने कभी इन देशभक्तों के बारे में जानने की कोशिश नहीं की होगी , लेकिन आज मात्र एक पन्ने पर इतना कुछ सुलभ होने पर लोगों की दृष्टि सिर्फ जात-पांत पर ही टिक रही है। हैरत भी है और अफ़सोस भी।

मैंने इसीलिए प्रारंभ में ही विवेकानंद जी की पंक्तियाँ पेस्ट की थीं...जिन्हें स्वयं भी नाज़ है अपने कायस्थ कुलोदभव पर।

नोट--

१-जो स्वयं पर गर्व नहीं करता वो , देश और समाज को गौरवान्वित कैसे करेगा ?
२-जात-पात से ऊपर उठकर लेख को पढ़ें और उपलब्ध जानकारी को आत्मसात करें और मित्रों से बाटें।

यदि हम अपनी माँ पर गर्व करते हैं तो बुरे हो गए ?
यदि हम अपनी राष्ट्रभाषा पर गर्व करते हैं तो कोई बुराई है ?
यदि हम अपनी सांस्कृतिक धरोहर पर गर्व करते हैं तो वेदों में वर्णित वर्ण व्यवस्था की जानकारी को जात पात की संज्ञा क्यूँ ? क्या कायस्थों के बारे में पढने या लिखने से हमारी सोच प्रदूषित हो जायेगी ? क्या कायस्थों पर पोस्ट लिखने से समाज में जात-पात फैलने का खतरा है ?

क्या दोष हमारी संकुचित मानसिकता का नहीं है ? क्या हम इतने कमज़ोर हैं ? काश मेरे पाठक भी जात-पात से ऊपर उठकर इस पोस्ट को पढ़ते और सराहते।

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बेचैन आत्मा said...

१२ जनवरी १९६३ को जन्मे नरेन्द्रनाथ दत्त [ विवेकानंद], रामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे ।
..12 जनवरी 1863 कर दीजिए। वर्तमान में मनुवादी वर्ण व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो चुकी है।

honesty project democracy said...

@ दिव्या जी
आपको यह पोस्ट यदि जात पात वाली लगती है तो बेहद खेद है आपकी समझ पर। आपके इस वाक्य के लिए शुक्रिया ये आपका बड़प्पन है ...

आपने मुझे आज ये एहसास करा दिया है की आपके पोस्ट पर टिप्पणी करते वक्त मैं आपके सोच को भी ध्यान में रखूं ...बहुत-बहुत धन्यवाद आपका ...

Coral said...

बहुत सुन्दर पोस्ट....

जब भी वक्त मिलता है आपका ब्लॉग पर जरुर आती हू ! आज कि जानकारी सच में रोचक है !

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

हमको सीर्सक में गलती नजर आ रहा है.. काया में अस्त नहीं काया में स्थित… संस्कृत में स्थ धातु का रूप होता है तिष्ठ.. यानी बैठना... वह जो सम्पूर्ण काया में स्थित है, कायस्थ कहलाता है.. लिस्ट में चकबस्त का नाम भी होना चाहिए था... बृज नारायण चकबस्त, जिनका लिखा हुआ रामायन एकमात्र उर्दू रामायन है..

डॉ टी एस दराल said...

कायस्थों के बारे में आश्चर्यजनक जानकारी मिली । आभार । कृपया स्वामी विवेकानंद जी की जन्म तिथि सही कर लें ।

dhratrashtra said...

मैं सिर्फ भावों को महसूस कर पाता हूँ और तुम्हारे लेख में छिपे भाव इसके जतिवादक होने की कहीं भी पुष्टि नहीं करते। हर व्यक्ति को खुद पर, अपनी पृष्ठभूमि पर नाज करने की स्वतंत्रता है। हाँ अहंकार नहीं होना चाहिए। अहंकार असहनीय है। मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है।

ZEAL said...

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सलिल जी,
शीर्षक मुझे भी कुछ गड़बड़ लग रहा था। आपके राय से इसे सुधार लिया है। अब ठीक लग रहा है।

देवेन्द्र जी, दाराल जी,
भूल सुधार ली है। सन १८६३ कर दिया है। ध्यान दिलाने के लिए आभार।
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ZEAL said...

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@-honesty project democracy

मैंने अपनी बात स्पष्ट करनी चाहि थी। आपको दुःख हुआ है तो आपसे करबद्ध क्षमा मांगती हूँ।

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अमित शर्मा said...

काफी अच्छा और प्रचुर जानकारीपूर्ण लेख के लिए धन्यवाद् .

प्रवीण पाण्डेय said...

ईश्वर से प्रार्थना है कि देश के समस्त नागरिक इन महान व्यक्तित्वों के गुण अपनाने का हर संभव प्रयास करें क्योंकि इन व्यक्तित्वों ने भी सदैव गुण और त्याग को ही महत्व दिया है।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

जब कोई इंसान जन्म लेता है और परवरिश पाता है तो वह किसी भी जाति या धर्म का हो सकता है, किंतु जैसे ही वह महानता को प्राप्त कर एक इतिहास रचता है वह राष्ट्र की सम्पत्ति हो जाता है और तब उसके सथ जुड़ा जाति, धर्म, सम्प्रदाय का नम समाप्त हो जाता है... अगर महापुरुषों का इतिहास देखें तो हर जाति, धर्म, सम्प्रदाय की विभूतियाँ मिलेंगी..अतः मेरी कमीज़ उससे सफेद कैसे की बात व्यर्थ साबित होती है… इस पोस्ट की आवश्यकता नहीं थी...विवेकानंद, सत्यजीत रे और लाल बहादुर शास्त्री पर किसी जाति विशेष का अधिकार नहीं हो सकता...

मनोज कुमार said...

मैंने ये पोस्ट लोगों की जानकारी हेतु लिखी है। बहुत बार मैंने कायस्थ का इतिहास जानना चाह तो नेट पर उतनी जानकारी उपलब्ध नहीं थी । न ही घर परिवार को इतना मालूम होता है ।
आपने बिल्कुल सही कहा है। कायस्थ होते ही इन सब बातों की जनकारी मुझे पहली बार मिली है। और ये भी जाना कि विवेकानंद भी कयस्थ हैं।
आभार आपका।

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
काव्य प्रयोजन (भाग-८) कला जीवन के लिए, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

Sunil Kumar said...

दिव्या जी कायस्थ कुल के बारे में अच्छी जानकारी दी आपने धन्यवाद

राजेश उत्‍साही said...

दिव्‍या जिन विभूतियों का आपने जिक्र किया है उनके बारे में एक सचेत भारतीय हमेशा से ही जानता रहा है। लगभग सब के बारे में हम अपनी पाठ्यपुस्‍तकों से लेकर तमाम पुस्‍तकों में पढ़ते रहे हैं। इसलिए माफ करें यह जानकर कि वे कायस्‍थ थे,कम से कम मेरे मन उनके प्रति सम्‍मान में न तो कोई कमी हुई है और न बढ़ोत्‍तरी। वह इसलिए भी क्‍योंकि यह सम्‍मान उन्‍होंने जो काम किया है उसके कारण है,उनके जीवन दर्शन के कारण है। निसंदेह यह पोस्‍ट आपके अध्‍ययन और शोध का परिणाम है। पर डॉ दिव्‍या आप जानती हैं हर मनुष्‍य का खून तो लाल ही होता है, फिर कायस्‍थ हो या किसी और जाति का।
माफ करें,आप कह चुकी हैं कि इसे जाति के चश्‍मे से न देखा जाए। पर दिव्‍या विडम्‍बना यही है कि आपकी पोस्‍ट से ध्‍वनि यही निकलती है।

दर्शन लाल बवेजा said...

जानकारीपूर्ण लेख के लिए धन्यवाद् .

शोभना चौरे said...

दिव्याजी
कुछ साल पहले मेरी एक परचित थी मुझसे छोटी ज्योति श्रीवास्तव मुझसे उम्र में काफी छोटी थी लेकिन विचारो के धरातल पर काफी समानता रखते थे हम दोनों |दोनों ने काफी साल समाज सेवा में कार्य किये चूँकि हम लोग एक फेक्ट्री केम्पस में रहते थे तो सभी तरह के कर्यक्रम होते थे और वो सबमे निपुण थी ढोलक बजाना , तबला बजाना भजन गाना ,गाँवो में जाकर बच्चो को पढ़ानाअदि आदि| उनके पति भी iit से थे और बाद में मालूम पड़ा की वो खुद भी phd थी कितु दोनों इतने सिंपल थे की मेरे जैसे लोग उनसे काफी प्रभावित है और भी कितने ही श्रीवास्तव लोगो को मैंने ज्ञान से भरपूर पाया है मेरा ये उदाहरन देने का अर्थ यही है की आपने जिन महान लोगो का जिक्र किया है उन्हें तो नमन है ही किन्तु कितने ही कायस्थ जो हमारे आसपास है प्रतिभावान! वे भी काबिले तरफ है |और हर क्षेत्र में अव्वल है |
बहुत जानकारी से परिपूर्ण पोस्ट और जानकारी में व्रद्धी करती टिप्पणिया |

ZEAL said...

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आदरणीय सलिल जी,

आपने इस पोस्ट की आत्मा को नहीं समझा। इसे जात-पात के चश्मे से देखा। इस बात का मुझे खेद है।

आपको मेरी पोस्ट व्यर्थ एवं अनावश्यक लगी, इसके लिए आपसे क्षमा मांगती हूँ।
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ZEAL said...

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आदरणीय राजेश उत्साही जी,

सभी लोग आपकी तरह विद्वान् नहीं हैं। बहुत से लोगों के लिए , जिनमें मैं भी शामिल हूँ के लिए यहाँ प्रस्तुत जानकारी नयी एवं उपयोगी है।

आपको मेरी पोस्ट से दुखद ध्वनि आई , उसका खेद हैं। उसे इग्नोर कर दीजिये जैसे मैंने आपकी टिपण्णी से आती दुखद ध्वनि को इग्नोर कर दिया।

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ZEAL said...

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पृथ्वी पर उपस्थित सभी मनुष्यों को खुश नहीं किया जा सकता। आप अपना सर्वस्व भी लुटा देंगे तो आधी जनता सदैव नाखुश ही रहेगी।

जिस प्रकार कुछ को मीठा पसंद होता है तो कुछ को चटपटा , उसी प्रकार मेरी पोस्ट्स कुछ लोगों को सार्थक लगती हैं तो कुछ को निरर्थक।

इश्वर भी अपने बनाए बन्दों को खुश नहीं कर सका--आधे नास्तिक हैं, तो फिर मेरी पोस्ट्स से हर व्यक्ति कैसे संतृष्ट हो सकता है भला ?

अपना काम है लिखना। ये सोचकर लिखती हूँ की इससे कुछ भला होगा लोगों का। आगे भी लेखन जारी रहेगा।

आभार।

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सत्यप्रकाश पाण्डेय said...

अच्छी और ज्ञानवर्धक जानकारी,

यहाँ भी पधारें :-
अकेला कलम...

Akshita (Pakhi) said...

महान लोगों के बारे में कित्ती अच्छी जानकारी....बढ़िया लगा.
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'पाखी की दुनिया' में आपका स्वागत है.

सतीश सक्सेना said...

@ डॉ दिव्या,
निम्न टिप्पणी अरविन्द मिश्र जी के ब्लाग पर दी गयी है , चूंकि आपका सन्दर्भ है अतः उसे यहाँ भी कर रहा हूँ, आशा है उचित निगाह से ही समझेंगी ! सादर

" "महापुरुषों को किसी जाति की श्रेणी में रखना उचित नहीं है ."

मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ ! अपना पक्ष बताऊँ तो मैं उन्हें महापुरुष ही नहीं मान सकता जो किसी जाति विशेष से बंधे रहे हों और उन्हें अपनी जाति के लिए काम करते हुए गौरव महसूस हुआ हो !

मगर डॉ दिव्या श्रीवास्तव को भी मैं दोषी नहीं मानता कि उन्होंने कायस्थों से जुड़े महापुरुषों का नाम लिया और इसका उन्हें गर्व महसूस होता है ! अपने कुलसंस्कृति और समाज की बात करते हुए यदि वे अपने पितामह और पूर्वजों के गौरव को याद कर रही हैं तो यह एक सामान्य बात है और यह किसी भी भांति दुराग्रह की श्रेणी में नहीं रखा जाये तभी बेहतर होगा !

व्यक्तिगत तौर पर मैं जातिवाद का उल्लेख और खास तौर पर पुराणों के सन्दर्भ में कहना निंदनीय मानता हूँ , इससे बचा जाना चाहिए ! हमारे आदिग्रंथों में जातियों के बारे में विभिन्न विभिन्न व्याख्याएं दी गयी हैं जो आधुनिक काल में खरी और सही नहीं मानी जाती ! लोग अपनी अपनी बुद्धि के हिसाब से इसका अर्थ निकालते और समझते रहे हैं ! कटुता से बचने के लिए हम, इन सन्दर्भों का उपयोग न ही करें तो बेहतर हैं !

आपसे एक अनुरोध करता हूँ आप दोनों के मध्य जो भी कटुता पैदा हुई वह आप लोगों के लेखों से अब भी झलकती है यह उन लोगों के लिए कष्टदायक हो सकती है जो दोनों को पढना पसंद करते हैं अथवा जो निष्पक्ष रहना चाहते हैं ! आप लोग जब कडवे कमेन्ट लिखते हैं तो निस्संदेह आपके पाठक भी दो पक्षों में बंट जाते हैं जिनका इस झगडे से कोई सरोकार नहीं !

आशा है बुरा नहीं मानेंगे !

सादर

शिवम् मिश्रा said...


बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

P.N. Subramanian said...

काफी कुछ जानने और सीखने को मिला. आभार.

Vijai Mathur said...

विरोध के लिए विरोध करना हो तो दूसरी बात है वरना सत्य को सामने आने से रोकना नहीं चाहिए.आजीवन जातिवाद के विरोधी डाक्टर राम मनोहर लोहिया की पुस्तक ''इतिहास चक्र'' को पढ़े बगैर जातिवाद पर कहना व्यर्थ है.मूल शंकर तिवारी(महर्षि स्वामी दयानंद) के प्रिय शिष्य स्वामी श्रद्धा नन्द जो पुलिस अधिकारी का पद छोड़ कर आये थे जन्मना कायस्थ ही थे.कायस्थ संस्कृति का ही प्रभाव था कि दयानन्द जी की हत्या के बाद जहाँ अन्य लोग घबराए थे श्रद्धानन्द जी डटे रहे और हरिद्वार में प्रथम गुरुकुल की स्थापना की जिस में सब से पहले अपने बेटा -बेटी को भेजा तभी अंग्रेजी स्कूलों के बहिष्कार की बात की.वह जामा मस्जिद से बोलने वाले पहले सन्यासी थे.अंग्रेज सरकार ने एक सिरफिरे दरोगा के माध्यम से उन की भी हत्या करा दी.भारत में गुरुकुलों की पुनर्स्थापना करने वाले श्रद्धानंद जन्म से कायस्थ थे;कहना गलत नहीं होगा वह अन्य सभी महानुभावों से श्रेष्ठ थे उन का बलिदान अमर है.
राधा स्वामी मत को व्यापक बनाए वाले दुसरे गुरु भारत के प्रथम पोस्ट मास्टर जनरल भी माथुर कायस्थ थे.

मनोज कुमार said...

यही तो दुर्भाग्य है।
जो जानकारी है, जो तथ्य है, जो इतिहास है, उससे इतर लोग इस पोस्ट को पढ रहे हैं, पोस्ट गढ रहे हैं। इसके महत्व को महत्व न देते हुए क्या क्या बक रहे हैं। मैं तो आज इसे पुनः पढने आया कि अपने बच्चों को भी बता सकूं इस जाति के बारे में जो ऐताहिसिक बातें हैं। बहुत मूल्यवान पोस्ट।
आपका पुनः आभार।

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

अलाउद्दीन के शासनकाल में सस्‍ता भारत-१, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

Babli said...

बहुत ही सुन्दर, शानदार, लाजवाब और ज्ञानवर्धक पोस्ट के लिए धन्यवाद!

Asha said...

बहुत सही और सटीक जानकारी देती रचना |बधाई
आशा

ZEAL said...

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आदरणीय सतीश सक्सेना,

बेहतर होगा यदि आप अरविन्द मिश्र की चर्चा यहाँ न करें तो। वे अपने ब्लॉग पर क्या लिखते हैं, उसे यहाँ बताने की जरूरत नहीं है। मैं उन्हें बहुत अच्छी तरह जानती हूँ तथा उन्हें कतई पसंद नहीं करती। वे मेरे अग्रज हैं, यदि वे मेरी चर्चा के बजाये देश की महान हस्तियों की चर्चा करें , तो पाठकों को लाभ होगा।

आभार।

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ZEAL said...

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हर रचनाकार को अपनी कोई एक रचना बहुत प्रिय होती है। यदि मुझसे कोई पूछे तो मुझे अपनी अब तक की सभी पोस्ट्स में सबसे बेहेतरीन और मूल्यवान पोस्ट यही है।

मुझे गर्व है खुद पर. अपनी सोच पर। अपनी मेहनत पर। समाज की खातिर जो कर रही हूँ उस पर। ये पोस्ट किसी एक दो व्यक्ति के लिए नहीं लिखी गयी है। इसका लाभ आने वाली संतति को मिलेगा।

मेरी इस पोस्ट का उद्देश्य हिंदी साहित्य को जानकारियों से समृद्ध करना है । किसी के व्यक्तिगत दृष्टिकोण से निराश होने वाली नहीं हूँ।

मेरे आगामी लेखों में ब्राम्हण समाज, क्षत्रिय समाज, तथा पिछड़ी जातियों का विषद वर्णन होगा, तथा उन कुलों में जो महान हस्तियाँ हुई हैं , उनकी चर्चा यहाँ की जायेगी।

मेरे देश के महापुरुषों एवं विद्वान् तथा साहसी महिलाओं को यही मेरी श्रद्धांजलि होगी।

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ZEAL said...

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"Charity begins from home "

Until unless I learn to respect my own community , how I will be able to respect others ?

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RAJAN said...

divya ji,
apki post kisi bhi tarah jaatiwaad ko bhadawa nahi de rahi. ye baat yahan aane wali tippaniyon se bhi spasht ho chuki hai. lekin mujhe lagta hai ki shobhna ji ka comment post ke saath nyaay nahi kar raha.unki baaton se lag raha hai ki kayasthon ko samaaj me heen samjha jata hai. unhe apne udahran ke baare me spasht karna chahiye ki ise yahan rakhne ki jarurat kyon padi?......asha hai shobhna ji aur aap meri baat ka bura nahi manengi.main kisi durbhavna ke tahat ye nahi puch raha hun.bas ek jigyasa hai.

दिगम्बर नासवा said...

कायस्थों के बारे में काफ़ी जानकारी दी है आपने .... बहुत सी नयी बातें ....... जान कर अच्छा लगा की इतनी मशहूर हस्तियाँ कायस्थ हैं ....

ZEAL said...

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विजय माथुर जी,

आपकी टिप्पणियां ज्ञानवर्धक हैं। समय के साथ लोग कितना कुछ जान जाते हैं और जब वे हम सबके साथ उन्हें बांटते हैं तो हमें भी नयी बातें मालूम होती हैं। इस ब्लॉग के माध्यम से अपने से बड़े , अनुभवी एवं ग्यानी जनों से बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है। आपकी टिप्पणियों ने पोस्ट की सार्थकता द्विगुणित कर दी है।

ऐसा ही कुछ हुआ था पिछले माह १६ अगस्त को। पिताजी के साथ चर्चा में इतना कुछ सीखा , और परिचय हुआ इन महान हस्तियों से। और प्रेरणा मिली उन्हें यहीं लिखने की।

इस पोस्ट को लिखते समय जब जय प्रकाश नारायण जी का उल्लेख आया तो , इंदिरागांधी द्वारा इमरजेंसी लागू हुई । इस शब्द की हिंदी बहुत सोचने पर भी ध्यान नहीं आई, तो अपनी सासु माँ से पूछा , उन्होंने तुरंत बताया ' 'आपातकाल' । फिर उनसे इस आपातकाल के बारे में चर्चा हुई। माँ को पुराने दिन याद आ गए। क्यूंकि मेरे ससुर जो भारतीय जनता पार्टी में वरिष्ट नेता थे , ने आपातकाल में १९ महीने ग्वालियर जेल में बिताये हैं।

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ZEAL said...

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राजन जी ,
शोभना जी ने महान हस्तियों के साथ साथ आम लोगों की भी प्रशंसा की है।

अब प्रसंग आया है , तो एक बात और ध्यान आयी। १९६८ में कायस्थों को शिड्यूल कास्ट में रखने की जद्दो-जेहाद चली , जो नाकामयाब रही।

तत्कालीन कायस्थों ने कहा --ठीक है , हमें शिड्यूल कास्ट बनने में कोई आपत्ति नहीं है , लेकिन हमें पिछड़ी जाती को मिलने वाले सभी रिसर्वेशन दे देना। सरकार को ये गवारा नहीं था। इसलिए उनकी दाल नहीं गली। लेकिन संभवतः बंगाल में इसे लागू कर दिया गया॥ इस पर प्रकाश , विजय माथुर जी डाल सकेंगे।

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ZEAL said...

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पाठकों की जानकारी के लिए-

Kindly refer page no 71 and 72 in the book - Caste and educational development by - M L Mathur.

The book is fully available on net.

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ashish said...

नीड़ का निर्माण दुष्कर ,मत हो तू हतप्राण
बाधा विविध ,तू एकला चल ,है झेलना तुझे कटु बाण

स्वेद से है तेरे सुशोभित ,पुरुषार्थ की परिभाषा
पाषाण उर से निकले है निर्झर,ऐसी हो अभिलाषा

नीरवता अपने अंतर्मन की , को मत करने दे कुठाराघात
बन उत्कृष्ट तू ,छू ले व्योम , निशा को बनने दे प्रभात

ZEAL said...

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मेल से प्राप्त टिपण्णी -

Dearest ZEAL:

Aati hain geb se yeh mazaami khayaal mein
‘Ghalib’ sarir-e-khaamaa navaa-e-sarosh hain


[Geb = Mysterious / Unusual, Mazaami = Thoughts / Topics,
Sarir-E-Khaamaa = Pen’s Scratching Sound,
Navaa-E-Sarosh = Sound Of An Angel]


The above couplet perfectly depicts your writing. Often your writing brings to the fore topics which are not the usual fare in that place and the notions presented in your work are also quite thought-provoking. The huge number of comments and deliberations bear ample testimony to the commanding prowess of your writing.

As you write on, dearest ZEAL, had it been on paper, the pen would have made the scratching sound as it moved across it. However, the beauty of your presentation and passion of yours that goes into the writing make it come across as the sound of an angel. Utterly Divine!

Arth Desai .

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शोभना चौरे said...

राजन जी
मेरा ये उदाहरन देने का आपने गलत अर्थ लगाया है दिव्याजी ने उसे स्पष्ट कर दिया है |जब हम सिर्फ अपने ही समाज में रहते है तो हम समझते है की हम ही सर्वोपरी है
|पछले कई दशको में प्रत्येक समाज को अपने घर परिवार अपने राज्य से दूर जाना पड़ा है और उसने आर्थिक उन्नति की है और इस बाहर जाने प्रक्रिया में अपने समाज के आलावा भी दुसरे समाज के लोगो से सम्पर्क स्थापित हुआ उंकी उपलब्धियों को जानने का करीब से मौका मिला और तब मेरे जैसे लोग जान पाए की हम तो कुए के मेंढक की भांति ही रहे थे अब तक | जब अपना दायरा बढाया उदार मन से तो दूसरो की उपलब्धी ज्यादा नज़र आई यही मेरा कहना था |लोग थोडा सा पढ़कर बढ़ चढ़कर अपना बखान करते है किन्तु मैंने कितने ही ऐसे लोगो की देखा है जो जिनके पास इतनी सम्मानीय डिग्री उच्चतर शिक्षा होती है जो रामकुमार वर्मा की गीत की इन पंक्तियों की भांति रहते है
फल से लदी डालियों से सीखो
नित शीश झुकाना
और उसी के अंतर्गत ये दम्पति का उदहारण दिया था |संयोग से वे कायस्थ है और मैंने अपने जीवन में पीछे जाकर देखा तो बहुत से प्रतिभाशाली लोगो को कायस्थ पाया |और ये तो दिव्या जी ने अभी पोस्ट लिखी है मै तो पहले अपने घर में चर्चा कर चुकी थी कुछ लोगो में विशेष प्रतिभा होती है उनमे काफी श्रीवास्तव है और कायस्थ लोगो के ज्यादा सरनेम की जानकारी नहीं थी मुझे |अच्छा ही हुआ ये पोस्ट पढ़कर मेरे मन की काफी बाते पुख्ता हो गई |बस जो विश्व विख्यात है उनके साथ ही और भी लोग प्रशंसनीय है यही मतलब था मेरा |

सुज्ञ said...

इस आलेख को जातिवाद की संज्ञा देना अन्याय है।
स्वजाति गौरव अन्य जाति का अपमान नहिं होता।
यदि ईष्यावश भी यह जहन में आये कि किसी का गौरव बोध हमारा हीन बोध है। और उसे जातिवाद की संज्ञा दें यह तो सरासर कुटिलता है।
यदि कोई जाति अपने महापुरूषो के प्रेरक जीवनगाथा से प्रोत्साहित होकर सफ़ल बनते है तो पूरे देश समाज के लिये हितकर है।

Vijai Mathur said...

दिव्या जी,
आप के उदगारों के लिए धन्यवाद.
विधवा पुनर्विवाह का कानून बनवाने वाले समाज सुधारक रजा राम मोहन राय,वनस्पतियों में जीवन की खोज करने वाले जगदीश चन्द्र बोस,अरविंदो घोष धार्मिक क्षेत्र में,आज़ादी के लिए क्रांतिकारी संघर्ष करने वाले लाला हर दयाल (इतिहासकार डाक्टर अगम प्रसाद माथुर की खोज के अनुसार माथुर कायस्थ ) औरंगजेब से ज़बरदस्त टक्कर लेने वाले शिवाजी भोंसले, I .C S और विख्यात लेखक जगदीश चन्द्र माथुर (रीढ़ की हड्डी नाटक के रचियता )कवि गिरिजा कुमार माथुर,साहित्य के क्षेत्र में और फिल्म उद्योग में मोतील लाल तथा मुकेश आदि सभी तो कायस्थ थे.इनमे से देश के प्रति किसी के भी योगदान को नकारा नहीं जा सकता है.

कायस्थ का वैज्ञानिक अर्थ है-

क-काया या ब्रह्मा
अ-अहनिर्श या लगातार
इ-रहने वाला
स्थ-स्थित

अस्तु हर वह व्यक्ति कायस्थ हो सकता है जो नित्य ब्रह्मा या काया की सेवा में लीन है.

(जहाँ तक बात बंगाल में कायस्थों के आरक्षण की है तो सितम्बर १९६७ में मैं बंगाल से चला आया था अतः १९६८ और बाद में वहां संपर्क नहीं हो सका.तब इंटर का छात्र था ज्यादा इस बारे में मालूम नहीं है अब जानने का प्रयास करूँगा तब बता सकूँगा)

वैसे मेरी व्यक्तिगत राय ये है कि जो कायस्थ चारों वर्णाश्रम व्यवस्था से ऊपर हैं उन्हें किसी प्रकार के आरक्षण कि आवश्यकता नहीं है.ज्ञान का विनिमय करने में कोई हर्ज़ नहीं है क्यों कि ज्ञान कंजूस का धन नहीं होता.

राकेश कौशिक said...

इस पोस्ट के लिए फिर से आपका आभार और सभी गुणी जनों तथा महान हस्तियों को मेरा सादर प्रणाम

अमित शर्मा said...

पता नहीं क्यों लोग बुद्धिजीवी बनने की अनर्गल होड़ में बुद्धि से असंगत बातें कर जातें है, अब यह पोस्ट जाती-वाचक कहाँ से हो गई???????????

महात्मा गाँधी भारत में पैदा हुए, लेकिन सारा विश्व उन्हें महान और आदर्श व्यक्तित्व मानता है तो क्या अब हम इन्हें सिर्फ इसलिए भारतीय कहना बंद करदें की इन्हें देश विशेष की सीमाओं में बांधने से इनकी म्हणता में कमीं आ जाएगी, क्या गांधीजी को भारतीय कहने में हम गर्व का अनुभव ना करें, क्या हम सीना फुला कर कहना बंद करदें की गाँधी जैसा व्यक्तित्व भारत में पैदा हुआ था ???????????

अमित शर्मा said...

महात्मा गाँधी भारत में पैदा हुए, लेकिन सारा विश्व उन्हें महान और आदर्श व्यक्तित्व मानता है तो क्या अब हम इन्हें सिर्फ इसलिए भारतीय कहना बंद करदें की इन्हें देश विशेष की सीमाओं में बांधने से इनकी महानता में कमीं आ जाएगी, क्या गांधीजी को भारतीय कहने में हम गर्व का अनुभव ना करें, क्या हम सीना फुला कर कहना बंद करदें की गाँधी जैसा व्यक्तित्व भारत में पैदा हुआ था ??????????? जो जाती की खिलाफत कर रहें है वे अपनी जाती भारतीय लिखवायेंगे, मतलब तो वही हुआ ना की भारतीयता भी अपने आप में एक पहचान है. एक बड़ी पहचान. हमारा घर भी हमारी एक पहचान होता है, लेकिन उसके अन्दर भी हमारा एक कमरा नियत है . घर के बाहर हमारा घर हमारी पहचान है घर के अन्दर हमारा कमरा. जाती का विरोध आँख मीच कर करने वालों से मैं विनम्रता-पूर्वक कहना चाहुंगा की. हम अगर एक ऐसा समाज बना सकें की हमारा एक अलग से घर होना जरुरी ना हों हम कहीं भी किसी भी घर में अपने ही घर की तरह रह पायें तो ही जाती रूपी पहचान का विरोध करें. सरकार के अलग अलग विभाग है उनमें काम करने वालों की अपने अपने विभागों से पहचान है क्या ख़त्म कर देनी चाहियें यह पहचान भी. डाक्टर की डाक्टर होने से , सैनिक की सेना में नौकरी करने से , मास्टर की पढ़ाने से. हर किसी की एक अलग पहचान आखिर क्यों है इतनी पहचान.

आप सभी आदरणीयों से यह बालक इतना ही निवेदन करना चाहता है की आप पुरानी चली आई पहचानों को ख़त्म कर दीजिये पर कोई ना कोई स्थानापन्न पहचान तो हर व्यक्ति की रहेगी ही. और अगर ना रहेगी तो किस तरह नहीं रहेगी आप बताने की कृपा करें.

RAJAN said...

@Shobhna ji,mujhe apni galti ke liye khed hai.galatfahmi me main kuch aur hi samajh baitha tha.par ab mujhe aapki baat ka marm samajh aa gaya hai.apni naadani ke liye kshama chahta hun.

प्रवीण शाह said...
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प्रवीण शाह said...

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दिव्या जी,

देश की कुछ गौरवशाली ' कायस्थ ' हस्तियों से मिलवाती आपकी इस पोस्ट से मुझे कोई शिकायत नहीं...अच्छी जानकारी दी आपने...

पर...

"ब्रम्हा जी ने जब सिष्टि की रचना की तो उनके सर से ब्रह्मण , भुजाओं से क्षत्रिय , जंघा से वैश्य तथा पैर के तलवों से शुद्र पैदा हुए । इस प्रकार ये चार वर्ण बने।

ब्रम्हा जी की काया से एक पुरुष कलम-दवात लेकर उनके समक्ष प्रकट हुआ। काया से प्रकट होने के कारण उन्हें कायस्थ कहा गया ।"


यह सब तो प्राचीन गल्प कथा ही है...एक कोशीय जीवन से आज के मनुष्य के बनने तक का विकासक्रम जब उद्घाटित-निर्धारित हो चुका हो तो कब तक आप या अन्य भी इन सब गल्पकथाओं पर यकीन करते हुऐ बार-बार उनको दोहराते रहेंगे ?...सोचिये...

एक बात और...आपकी पोस्ट पढ़ कर टिप्पणी करने वाला हर पाठक एक तरह से आपका अतिथि सा है...भूत में भले ही कितनी भी आपसी गलतफहमियाँ या विवाद हो गये हों...परंतु जिस प्रकार से ऊपर की एक टिप्पणी में आप पहले अपने एक पाठक की टिप्पणी नहीं छाप रही हैं और अपना जवाब दे रही हैं...फिर दूसरी टिप्पणी में सार्वजनिक रूप से उनका अपमान भी कर रही हैं...वह मानव सभ्यता के विरूद्ध है...

मैं लगातार आपकी पोस्टें व कमेंट पढ़ने के बाद विश्वास से यह कह सकता हूँ कि कोई भी मतवैभिन्य/आलोचना होने पर आप जो व्यवहार करती हैं उसे परिपक्व तो कतई नहीं कहा जा सकता...आपसे इस विषय में सुधार की आशा रखता हूँ...

{यकीन जानिये आप यदि इस टिप्पणी को न भी छापें तो मुझे कोई शिकायत न होगी...मेरे लिये इतना काफी है कि अपना मत आप के सामने रख दिया...:)}

आभार!


...

सम्वेदना के स्वर said...

दिव्या जी..
मैं निगेटिव बातोंके खिलाफ रहा हूँ.. मैं अहिंसा में विश्वास नहीं रखता, क्योंकि इसमे “न” जूड़ा है... मैं इतना प्यार करने में विश्वास रखता हूँ कि व्यक्ति उसकी हिंसा की बात भी न सोच सके.. अब ये प्यार चाहे कीट से हो या वृक्ष से, मनुष्य से हो या पशु से... वैसे ही मैंने आपकी पोस्ट को व्यर्थ नहीं कहा, मैंने कहा कि श्रेष्ठता की बात व्यर्थ है... और मैंने यह कहा कि इस पोस्ट की आवश्यकता नहीं थी.. यह नहीं कहा कि यह पोस्ट अनावश्यक थी...
मुझे तो आश्चर्य हो रहा है उन लोगों पर जो कायस्थ कुल में जन्म लेने के बाद भी इस पोस्ट से पहले तक अपने वंश के इतिहास से अनभिज्ञ थे.. मैं तो जब से नेट विद्या में दीक्षित हुआ तब से यह जानकारी लिए बैठा हूँ. और चित्रगुप्त पूजा पर जो कथा होती है उसमें यह सब वर्णित है… कई कंट्रोवर्सीज़ भी हैं जैसे उसमेंयह भी लिखा है कि भीष्मपितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान चित्रगुप्त ने दिया था... पता नहीं मैंने महाभारत में ऐसा कोई उल्लेख नहीं पढा..
मुझे भी गर्व है अपने कायस्थ होने पर… किंतु यह गर्व मुझे बिहारी और सबसे पहले भारतीय होने के गर्व से कम प्रतीत होता है...
वैसे आपका विरोध अनुचित है मेरे प्रति, क्योंकि आपने गलत शब्दों को पकड़कर विरोध जताया है.

Priya said...

congrats for your thorough study and unfolding knowledge.

Sadar Pranam to your father.

I request to everbody to propagate the knowledge disseminated by Mr P. Bhakuni.

Vastron aur moolyon ka moolya samaapt kar ke hamara desh kis adhaaa patan ko jaa raha hai.

An addition: Satyendra Nath Bose, Great Physicist famous for 'Bose-einstein condensation'
Once Fermi, another physicist was accompanying him to his college in erstwhile Calcutta in his car. Several students of Bose met in the way.
Everytime Bose stopped, got the student in his car. Car was full now.Students started to sit on the roof. Fermi was frustated.
Who are they? he asked.
Bose replied 'they are BOSONS, my students, all of them may come in my car"
Fermi returned to his country and coined another term- FERMIONS- only one can be in one state (car).
Although both the terms are important in physics but the choice reflects the culture of respective countries.

We believe in inclusion and collective presence(e.g. joint family) whereas Europeans believe in exclusion and give priority to indiviuality and not society.

Divya ji , I am awe-struck at powerful presentation.

Regards to one and all

Mrs. Asha Joglekar said...

दिव्या जी आपकी पोस्ट और टिप्पणियाँ पढकर जानकारी में काफी विस्तार हुआ । इनमें से हर एक कायस्थ होने का साथ साथ एक श्रेष्ठ बारतीय भी है । हम िन जैसा बनने के लिये प्रयत्न शील भी हों तो बडी बात है । लाल बाहदुर शास्त्री जी के बारे में एक बात उल्लेखनीय है कि जिस तरह इंदिराजी को 1971 बंगला देश युध्द का विजेता माना जाता है, शास्त्री जी नें देश पर थोपा गया 1965 का युध्द बडी सफलता से जीता जब कि उन्हें इस देश की बागडोर सम्हाले मात्र एक वर्ष ही हुआ था । और जीता हुआ हिस्सा वापिस करवाने की रशिया और अमरीका की चाल को वे सहन नही कर पाये इसी धक्के से उनकी मृत्यु हुई ।

ZEAL said...

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आदरणीय प्रवीण शाह जी,

आप लोगों से बहुत कुछ सीख रही हूँ। कोशिश करुँगी खुद में परिपक्वता लाने की। आप सभी की मुझसे जो अपेक्षाएं हैं, उनपर खरा उतरना है मुझे। अपनी भूलों के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ।

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ZEAL said...

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आदरणीय प्रिया जी,

आपके शब्दों से मेरे हतोत्साहित मन को बहुत सहारा मिला है... आभार।

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निर्मला कपिला said...

अपकी ये पोस्ट बहुत अच्छी और सार्थक है आज ऐसी विभूतिओं के बारे मे नई पीढी को अधिक से अधिक जानने की जरूरत है। कभी वो समय भी आयेगा जब हमारी नई पीढियां ये विश्वास नहीं करेंगी कि भारत मे ऐसे महान लोगों ने जन्म लिया आज अगर नज़र डालें तो एक भी ऐसा व्यक्तित्व नज़र नही आता जिसके आगे नतमस्तक हुया जा सके। ये जातिवाद को बढावा देना नही मगर उस जाति के लिये गौरव की बात है जिसमे ऐसी विभूतों ने जन लिया और अपने गौरव को कोई क्यों न बताये? आप बहुत अच्छा लिखती हैं और आशा करती हूँ कि ऐसी और विभूतिओं के जीवन के बारे मे भी लिखें देश भक्तों शहीदों के बारे मे भी लिखें और इसे अपने ब्लाग की पहचान बना लें। आलोचना से हत्तोत्साहित होने की बजाये इसे चुनौती की तरह लें।इससे आत्मविश्वास और बढेगा। शुभकामनायें

संजीव गौतम said...

आदरणीय दिव्या जी आपकी मेहनत के लिए बधाई लेकिन चुप रहने की बहुत सोचकर भी चुप नहीं हो पा रहा हूं। आपने जितने नाम यहां लिए सबमें एक विषेशता देखिए-आदरणीय विवेकानन्द, राजेन्द्र प्रसाद जी, हरिवंषराय बच्च्न जी, लालबहादुर “ाास्त्री जी, “ाायद ही किसी के नाम में जाति लिखी हो। ये महापुरूश थे जाति से ऊपर उठे हुए। उन्हें आज किसी जाति के कुल गौरव के रूप में देखकर दुख हो रहा है। मुझे इससे कोई गुरेज नहीं कि आप किसी को किसी भी नजरिये से देखें लेकिन सार्वजनिक रूप से महान हस्तियोें को जातिगत रूप से देखना अच्छा नहीं लगता है। पहले ही ये तमाषा बहुत हो चुका है। अच्छा होता कि आप इन महानुभावों की जाति बताने के साथ-साथ उनके उन वक्तव्यों से भी रूबरू करवाती जिसमें उन्होंने अपनी जाति का उल्लेख करते हुए अपने को गौरवान्वित महसूस किया हो। एक महान आत्मा अपने को जातिगत धारणा से दूर रखती है और कुछ सालों बाद उसकी जाति बताई जाय ये उस महापुरूश का अपमान है। सम्मान नहीं। माफ करियेगा यदि कुछ बाते आपको अच्छी न लगें। आप किसी भी महापुरूश की जाति की चर्चा करती चाहे वह कायस्थ न भी हो तो भी मेरी आपत्ति होती

अनोप मंडल said...

आत्मन बहन दिव्या जी,आपने जो लिखा है उसमें कहीं भी ऐसा कोई दुराग्रह प्रतीत नहीं होता कि आप किसी को श्रेष्ठ या किसी को तुच्छ बताने का प्रयास कर रही हैं।"यत पिण्डे तत ब्रह्माण्डे" वाली उक्ति को मानें तो आप राक्षसों को उत्तर दे सकती हैं कि मनुष्य किसी लिजलिजे एक कोशकीय प्राणी से विकसित नहीं हुए बल्कि सभी मनुष्य कायस्थ हैं और जीवात जीवोत्पत्ति के अमिट सिद्धाँत से मनुष्य से ही मनुष्य पैदा हुए हैं। जो भी काया(पिण्ड) और ब्रह्माण्ड(सृष्टि) को समझता है वह कायस्थ है चाहे वह किसी भी वर्ण में जन्मा हो क्योंकि हमारी वर्ण व्यवस्था जन्म से नहीं कर्म से बनी है वरना वेदों के ऋषि सत्यकाम जाबाल जो कि एक वेश्या के गर्भ से उत्पन्न शूद्र कुल के थे क्योंकि उनके पिता का तो नाम नहीं था लेकिन ज्ञान होने के कारण वे ऋषि स्वीकारे गये। कायस्थ यानि कि हर वो मनुष्य जो जड़बुद्धि नहीं है। प्रकृति में भी छोटा-बड़ा होने की व्यवस्था गुणसूत्रों के आधार पर तो है ही न। यदि कर्मणा किसी जाति-प्रजाति-उपजाति में ऐसे गुणसूत्र लाखों साल में विकसित हुए हैं तो उसे स्वीकारने से कोई छोटा तो हो नहीं जाएगा। श्रेष्ठता की दुंदुभि नहीं पीटनी पड़ती वह स्वयं अपना प्रमाण होती है।
रही बात प्रवीण शाह जैन, अरविंद मिश्र जैसे लोगों का तो जैन राक्षस होते हैं इस बात पर खुल कर जो भी चाहे चर्चा कर सकता है इनका काम ही विद्वजनों को दिग्भ्रमित करने का प्रयास करना है इस बात की पुष्टि आप वेद विद्वान स्वामी दयानन्द सरस्वती के लिखे मानव इतिहास के महान गृन्थ "सत्यार्थ प्रकाश" के बारहवें अध्याय से पुष्टि कर लीजिये, मिश्र तो वर्णसंकर(हाइब्रिड) है ये आप सभी देख समझ सकते हैं कि ये वो धूर्त है जो कि राक्षसी प्रवृत्ति के होने के बाद भी ब्राह्मणों के साथ घुलमिल कर स्वयं को ब्राह्मण जताने लगे हैं लेकिन इनकी अलग पहचान बनी रहे इसलिये ये अपने उपनाम को मिश्र(मिलाजुला) लगाए रहते है, जैनों के साथ सांठगांठ होने में कोई संदेह नहीं है।
आपसे अपनी बात कि हो सकता है कि आप किसी भयवश इस टिप्पणी को प्रकाशित न कर पाएं किन्तु हमने आप तक अपनी बात पहुंचा दी,कई बार इतना बड़ा सत्य सहज भाव से स्वीकार पाना कि जैन राक्षस होते हैं या मिश्र वर्णसंकर आसान नहीं हो पाता लेकिन ये तो हम कह रहे हैं आप तो बस हमारा मत सामने रखेंगी।
भड़ास निकालने के लिये अवतार स्वरूप हम गरीबों के तारणहार डॉ.रूपेश श्रीवास्तव जी का मंच है जिस पर आने का साह्स आसानी से दुष्टजन कर ही नहीं पाते।
बेहतरीन आलेख है साधुवाद स्वीकारिये
सादर
समस्त अनूप मंडल

ZEAL said...

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आदरणीय अनूप मंडल जी,

आपके शब्दों से बहुत ताकत मिली, ये विश्वास भी बुलंद हुआ ही मैं गलत नहीं हूँ। आपकी तरह साहस के साथ, निःस्वार्थ होकर आगे बढ़ना है मुझे । आपने इस लेख के पीछे की पवित्र भावना को समझा तथा मुझे हिम्मत दी , इसके लिए ह्रदय से कृतज्ञ हूँ आपकी ।

आपके आशीर्वाद की आकांक्षी,
दिव्या।

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ZEAL said...

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आदरणीय प्रिया जी,

उस दिन , शाम को पिताजी के साथ ४-५ घंटे चर्चा हुई थी , अँधेरा घिर आया था, चाय की याद भी आ रही थी , लेकिन चर्चा जारी थी। यह पोस्ट अपने वृद्ध पिताजी को समर्पित है, जिन्हें केवल आपने याद रखा इतने वाद-विवाद के बीच। भावुक होकर आपका एक बार पुनः आभार।

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डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

प्रिय दिव्या बहन,आपने जो लिखा है वह आपको निःसंदेह साधुवाद की पात्रता देता है। उपनाम से कोई यदि कायस्थ होने का दम भरे तो ये बात कदाचित संकुचित विचार हो सकती है। कोई भी ज्ञानी कायस्थ ही होता है। आदरणीय अनूप मंडल ने कई बातें लिख दी हैं उनमें से अधिकाँश से मेरी सहमति जानिये।
सादर
डॉ.रूपेश श्रीवास्तव

ZEAL said...

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आदरणीय डॉ रुपेश [मेरे भाई ],

मैंने मन की बहुत पवित्र भावना से ये लेख लिखा था। मेरे लिए ये जानकारी नयी थी , तो सोचा सबके लिए उपयोगी होगी। आप के साथ कुछ लोगों ने इस लेख से जुडी पवित्र भावना को समझा और सराहा। यदि मैंने इन महापुरुषों की जन्म तिथि और माँ-बाप का सही नाम तथा स्थान यहाँ लिखा , तो उनके कुल का परिचय लिखकर क्या गुनाह किया ?

आपने इस लेख की पवित्र भावना को समझा , इसके लिए आपका आभार।

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ZEAL said...

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जैसे मैं गौरवान्वित हूँ की ये महापुरुष मेरे भारत के हैं, वैसे ही क्यूँ नहीं सभी सोच रहे ?

अमित शर्मा जी ने बहुत अच्छा प्रश्न रखा है सबके सामने। गौरतलब है।

आशा है मेरे पाठक ये समझने की कोशिश करेंगे की दिव्या की भावना क्या है ।

स्पष्टिकरण की कभी आवश्यकता नहीं पड़ी मुझे , फिर भी ये बता दूँ की ये लेख सिर्फ ऐतिहासिक तथ्यों को लोगों की जानकारी के लिए सामने लाया गया है।

आभार।

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डा० अमर कुमार said...
This comment has been removed by the author.
ZEAL said...

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दो मस्ती भरी छेड़-छाड़ मेरी दोस्तों के साथ--

जब मैं दसवीं कक्षा में थी , मेरी दोस्त ' विनीता धवन ' ने कहा - " दिव्या , सुना है कायस्थ बहुत बुद्धिमान होते हैं , लेकिन तुम अपवाद हो "

मैंने कहा तुमने सुना भी ठीक है और मैं अपवाद हूँ , ये भी सच है।

फिर मैंने विनीता से कहा- " मैंने भी खत्रियों के बारे में कुछ सुना है , लेकिन तुम अपवाद नहीं हो "

उसने पूछा -- क्या सुना है ?

मैंने कहा--

खत्री पुत्रं , कभी न मित्रं , जब मित्रं तब दगी-दगा।

इसके बाद तो उसका हँसते-हँसते बुरा हाल हो गया।

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ZEAL said...

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दूसरा मजेदार वाकया--

कुछ वर्ष पूर्व जब बड़ी बहेन की शादी तैं हुई , तो बहुत से लोगों को आपत्ति हुई। क्यूंकि मेरे जीजाजी 'शुक्ल' ब्रह्मण हैं। , कार्ड देने मैं अपनी मित्र 'सपना-पाण्डेय' के घर पहुंची । तो उसने मुझे बताया--

" दिव्या तुम लोग बहुत भाग्यशाली हो जो दीदी की शादी कानपुर के बीस-बिस्वा , कान्यकुब्ज ब्राम्हण' में हो रही है। "

अब अकड़ दिखाने की मेरी बारी थी -- हमने भी कह दिया-

" जीजाजी के घर वालों को खुश होना चाहिए की भगवान् चन्द्रगुप्त की सबसे बड़ी संतान के घर उनका रिश्ता हो रहा है। "

और फिर दोनों ही भौतिकी में प्रोफ़ेसर , तो दोनों में बड़ा कौन ?

फिर मैंने कहा - बहेन की खातिर नहीं तो लड़के वालों की खातिर शादी में जरूर आना।

सभी हंसने लगे।

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ZEAL said...

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My family is of cosmopolitan views. we have whole India in my maternal and fraternal side . My mother-in-law in Maharashtrian, My sister in Law is Punjabi, Jijaji is bramhan .

Regards.

Vijai Mathur said...

Divyaji,
Kolkata ke logon sey gyat hua ki W.B.mey bhi Kayasthon ka reservation nahi hai.Jatigat tipniyon per aapne Mafi va Khed shabdon ka istemal kiya,unkey liye RASHTRA KAVI Mathlisharan Gupta ki yeh panktiyan hain:-
JISEY NA SWADESH VA SWA-JATI KA SWABHIMAN HAI,
WAH NAR NAHI PASHU NIRA ADHAM SAMAN HAI......

ZEAL said...

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आदरणीय विजय माथुर जी,

" जिसे न स्वदेश वा स्वजाति का अभिमान है ।
वह नर नहीं है , पशु निरा, अधम सामान है ॥

मैथिलि शरण गुप्त [ raashtriy kavi ]जी की बहुत सुन्दर पंक्तियाँ प्रस्तुत की हैं आपने। जिसने पोस्ट की सार्थकता को बढ़ा दिया है।

Maithili Sharan Gupt [1886-1964 ] was one of the pioneers nationalist poetry in 'Khari Boli' poetry and the author of the first ever epic in modern Hindi literature। for over 57 years, Gupt wrote over sixty works, comprising forty nine collections and seventeen translations of poetry and drama. He was perhaps, the only poet in Independent India to be honoured with the title 'National Poet'.

आभार।
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ZEAL said...

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From Priya by mail-

Dear Divya,

I am following the comments . Do not be discouraged . Few lines for you from a well known Hindi poet ...

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को

Priya

..

Rakesh Kumar said...

मौका मिलने पर आपकी इन पिछली पोस्टों को भी पढ़ने की कोशिश करूँगा.बड़ी दिलचस्प जानकारियाँ से पूर्ण हैं आपकी ये पोस्ट.कायस्थ का पौराणिक इतिहास व महान विभुतिओं के बारे में अवगत कराने के लिए आभार.

ZEAL said...

आपका स्वागत है राकेश जी , यह मेरा पसंदीदा आलेख है, जो पिताजी से हासिल जानकारियों के बाद लिखा है।

JC said...

दिव्या जी, देरी से आने के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ...

अपने, नई दिल्ली मंदिर मार्ग स्थित, स्कूल में मुम्बई (तब बॉम्बे) से आये कक्षा ८ से ११ तक के सहपाठी कायस्थ था और उसका उपनाम 'गेहा' था जो मैंने आपकी सूची में नहीं पाया... (इसके अतिरिक्त आपने उड़ीसा में सैकिया लिखा, किन्तु अपने निजी अनुभव के आधार में सैकिया/ हज़ारिका, आदि क्षत्रियों को दर्शाता है जिनके नियंत्रण में सौ/ हज़ार सिपाही होते थे... कृपया चेक कर लीजियेगा)...

संयोग से वो हमारी सरकारी कॉलोनी के निकट ही रहता था और मैं कई बार रविवार को साइकल से उसके घर जाया करता था, तो अधिकतर सड़क से ही वो मुझे दिखाई पड़ जाता था - अपने घर से बाहर निकल मैदान में पेड़ के नीचे आते, अथवा फिर से वापिस जाते...उसकी आदत थी रटने की, जिस कारण एक पेज पढ़ मन में उसे रटते हुए बाहर आता था, और उसके अनुसार ७-८ बार पढ़ वो उस पेज को हूबहू लिख लेता था... संक्षेप में, परीक्षाओं में वो बढ़िया अंक पाता था...

उसके कई वर्ष बाद वो मुझे अचानक एक दिन किसी बाज़ार में मिल गया... उसने बताया कि आई आई टी खड़गपुर से इंजीनियरिंग कर वो आई बी एम् कंपनी में कार्यरत था, और क्यूंकि मुझे उसकी रटने की आदत का पता था, उसने कहा कि अब वो एक पेज एक बार ही पढ़ उसे हूबहू लिख लेता था (जिस कथन से मुझे मस्तिष्क की कार्य विधि जानने के लिए प्रेरित किया)!

चित्रगुप्त ('चित्र' और 'गुप्त' कुछ संकेत करते हैं शायद?) आदि पर सांकेतिक भाषा में लिखे गये कथन पर मैं यहाँ पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहा हूँ...

ZEAL said...

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JC जी ,
इस नयी जानकारी से मुझे और पाठकों को रूबरू कराने के लिए आपका शुक्रिया। बड़े बुजुर्गों के ज्ञान भण्डार से ही विषय को विस्तार मिलता है और हम छोटों का भी लाभ होता है।
आपकी बहुमूल्य टिप्पणी के लिए ह्रदय से आभार।

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Rakesh Kumar said...

आज ही यूरोप के टूर से लौटा हूँ.सबसे पहले आपकी इस पोस्ट को पढ़ने का मन किया.स्वामी विवेकानन्द जी से ही मुझे नास्तिकता से आस्तिकता की ओर बढ़ने की प्रेरणा मिली.वे ही मेरे सर्वप्रथम आध्यात्मिक गुरू हैं.आपके पिताश्री और आपको मेरा हार्दिक नमन. सुन्दर जानकारियाँ प्रस्तुत की हैं आपने.बहुत आनंद का अनुभव किया.बहुत बहुत आभार इस शानदार पोस्ट की प्रस्तुति के लिए.

Bhushan said...

कल ही जानकारी मिली थी कि आपने इस विषय पर लिखा है. कायस्थों की महान हस्तयों में एक नाम और है जिसे आप इस लिंक पर देख सकती हैं- http://en.wikipedia.org/wiki/Maharishi_Shiv_Brat_Lal

विकिपीडिया के इस आलेख को विकसित करने में मैंने भी योगदान दिया है. विकिपीडिया के बनाए कुछ नियमों का पालन करते हुए वह नहीं कह सका जो मेरी जानकारी में था. शिवब्रत लाल जी ने 3000 हज़ार नहीं बल्कि लगभग 5000 पुस्तकों-पुस्तिकाओं और पत्रिकाओं की रचना की थी. वे राधास्वामी मत के पहले गुरु थे जिन्होंने अमेरिका की यात्रा की. ऊपर विजय माथुर ने राधास्वामी मत के जिन गुरु का उल्लेख किया है ये यदि उनका पूरा नाम मालूम हो सके तो बता सकूँगा कि ये उनके पूर्ववर्ती हैं या उत्तरवर्ती. मेरा जीवन इनके साहित्य से प्रभावित रहा है.

ZEAL said...

भूषण जी , आपने बहुत अच्छी जानकारी जोड़ी है। आभार।

प्रदीप श्रीवास्तव said...

दिव्या जी ,
नमस्कार ,
आप क़ी प्रतिक्रिया मैने अपने ब्लॉग पर पढ़ी थी|
लेकिन उत्तर देने में एक लम्बा अन्तराल हो गया,वह भी इस कारण की
दैनिक अखबार क़ी वयस्तता कुछ अलग ही होती है |समय काम मिल
पता है ख़ैर काफी रोचक बातें आप के इस आलेख से मिली ,जिसके
लिये आप को साधुवाद देना चाहता हूँ |
कल (२८ अक्तूबर २०११)को " कलम दावत " क़ी पूजा है,इस अवसर पर
आप का यह आलेख अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे ,इस लिये अपने फेस बुक
पर पोस्ट कर रहा हूँ ,बिना किसी पूर्व अनुमति के |
आशा है अनुमति देंगी |
शेष शुभ
प्रदीप श्रीवास्तव
फैजाबाद/निज़ामाबाद

ZEAL said...

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प्रदीप जी ,
आपको मेरी अनुमति है. आपको श्री चित्रगुप्त पूजा के लिए शुभकामनाएं।

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Viral Trivedi said...

वन्दनीय लेखन

मैने हिंदी में लिखना प्रारंभ किया है. जिसका श्रेय आपको देता हु. आपकी एक ही कोमेंट से मुझे ये स्फुरणा हुई है. जय हिंद.

aadhyatma-spritual said...

दिव्या जी,
किसी समय में लिखने और पढने से सम्बंधित समस्त गुरुतर कार्य को कायस्थ ही दक्षता और कुशलता से निर्वहन करते थे. कालान्तर में बदली हुई सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों ने सर्वाधिक क्षति इसी वर्ग को पंहुचायी.
आज भी शासकीय सेवाओं में कायस्थों की quantity भले ही कम हो गयी है पर उनकी quality अलग ही पता चलती है. इसे कायस्थों से इतर भी अनेक लोग खुल कर स्वीकार भी करते है और शेष मन ही मन स्वीकार करते हैं, भले ही उनमें से कुछ के मन में ईर्ष्या, द्वेष या वैमनस्य भी हो.
ऐसे ही कुछ लोग आपके ब्लॉग पर अनर्गल टिप्पणियां करके अपनी भड़ास को निकालने का तुच्छ कार्य करते हैं.
ऐसे क्षुद्र मानसिकता वाली टिप्पणियों को बीमार, हीन, ग्लानियुक्त, चिढ से प्रेरित मनोरोगी का प्रलाप समझ कर उपेक्षित कर देना चाहिए.
इसी सूची में फ़िराक गोरखपुरी, जिनको शायरी के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला है, लोकप्रिय कवि गोपाल दास नीरज आदि को भी स्थान मिलना चाहिए. हमें कायस्थ महापुरुषों, मनीषियों, साधकों, साहित्यकारों, समाजसेवियों आदि से प्रेरणा लेकर अपने को सार्थक और सफल बनाने का प्रयास करना चाहिए.

अपने कायस्थ होने पर हमें गर्व होना चाहिए और आपके इस कार्य हेतु शुभकामनाएं.

ZEAL said...

Adhyaatm ji-- Many thanks.

Anonymous said...

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Anonymous said...

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