Wednesday, September 22, 2010

एक अनाम रिश्ता -- प्यार का --

' आई लव यू '
ये वाक्य बहुत बार, बहुत लोगों को दोहराते सुना था , लेकिन कभी यकीन नहीं हुआ उनके शब्दों पर। क्या प्यार जैसा कुछ होता भी है ? क्या लोग प्यार के मायने समझते भी हैं ? क्या प्यार करने के पहले सोचते भी हैं , की निभा पायेंगे या नहीं ? क्या प्यार तपस्या नहीं ? क्या प्यार बलिदान नहीं ? क्या एक आदर्श प्रेम संभव है ?

क्या , आई लव यू कहने के पहले , कोई इनसे जुड़े दायित्वों के बारे में सोचता है?

प्यार की बहुत सी परिभाषाएं सुनीं और पढ़ी हैं । जाने क्यूँ कोई भी परिभाषा मन को उपयुक्त नहीं लगी। बहुत सोचा, मनन किया, की प्यार आखिर है क्या ? बस इतना ही समझी --

-प्यार एक एहसास है।
-इस रिश्ते का कोई नाम नहीं होता। अनाम है ये रिश्ता।
-इस रिश्ते को नाम देने के साथ ही ये एहसास समाप्त हो जाता है , और एक नया रिश्ता जीने की कवायद शुरू हो जाती है।
- प्यार में अंतर्मन अपने प्रिय के स्मरण मात्र से कभी मुस्कुरा उठता है तो कभी आँखों में आंसू छलक उठते हैं।
- प्यार में पीड़ा [वेदना ] तीव्रतम होती है , इस वेदना का सुख भी स्वर्गिक होता है।
- प्रेम तो सात्विक होता है, जो अपने प्रिय से कोई अपेक्षा नहीं रखता।
- ये प्रेम न तो वात्सल्य है, न करुण, न ही श्रृंगार। ये तो वीर रस से युक्त है जो अपने प्रिय की खातिर सब कुछ आहुत , करने को तत्पर होता है।
-सात्विक प्रेम निश्छल और निर्भय होता है।
- मुझे लगता है कि प्रेम कभी न ख़त्म होने वाला सिलसिला है।
- प्रेम सदैव एक तरफ़ा ही होता है , जो चुप-चाप खामोश होकर अपने प्रिय को फलता-फूलता देखता है, और उसी कि मुस्कुराहटों में खुद को सफल हुआ मानता है।

कुछ पंक्तियाँ अपने प्रिय के नाम --

प्रेम कलि जो खिली थी उर में, उसकी उमर कुछ मॉस की थी।
प्रेम कि अग्नि पावन है, वो वजह नहीं उपहास की थी ॥
इस जगत में सब कुछ नश्वर है, ख़त्म तो एक दिन होना है ।
मीठी यादों का झरना जिसमें , वो मेरे उर का कोना है॥
तुम रचे वहां , तुम बसे वहां , तू सदा रहोगे पूज्य वहां।
मथुरा में रहो, गोकुल में रहो, उर में मेरे है धाम तेरा॥

तुम कृष्ण मेरे , तुम राम मेरे ।
तुम ही हो , अभिमान मेरे ॥

आभार ।

77 comments:

cmpershad said...

‘क्या प्यार जैसा कुछ होता भी है ’

मान भी ले ऐ दिल तू अपनी ये हार.... किया जाता नहीं .. हो जाता है प्यार..:)

वाणी गीत said...

प्रेम पर कहने को और कुछ बाकी कहाँ रहा ....
बहुत प्यारी सी कविता ...

यशवन्त माथुर said...

आपने ठीक लिखा है सच्चा प्रेम निस्वार्थ होता है.
आप की जानकारी के लिए-'विद्रोहीस्वर' पर पापा का नया article डाल दिया है.

मनोज कुमार said...

दिव्या जी बहुत दिल से लिखी गई इस पोस्ट के लिए बधाई। इन दिनों मुझे भी इसे समझने का भूत चढा है। कई नज़्में और क्षणिकाएं अपने ब्लॉग पर पिछले एकाध महीने में लगाया है। एक नज़्म की कुछ पंक्तियां
ले आया
थोड़ी-सी मिट्टी
तेरे क़दमों के निशान से
रख दी है
डिब्बी में बंद कर
अपने पूजा घर में
प्रसंगवश याद आया, प्रमाणिकता मेरे पास नहीं है, पर कहीं सुना था, कि एक बार मीरा गा रही थी तो किसी ने कहा ज़रा राग में गाओ। वो सुनी नहीं पूछी कि क्या कहा? तो उसने लिख दिया "राग"। मीरा उठी और उसके पीछे "अनु" लगा दिया। बोली, "मैं तो अनुराग से गाती हूं। राग से दुनियां प्रसन्न होती है, अनुराग से प्रभु प्रसन्न होता है।"
इस पोस्ट की अंतिम कुछेक पंक्तियों से यह याद आ गया।

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

देसिल बयना-गयी बात बहू के हाथ, करण समस्तीपुरी की लेखनी से, “मनोज” पर, पढिए!

प्रवीण पाण्डेय said...

प्रेम का फैले उजाला, आँख चुँधियाने लगी,
घर रहो, मन ज़ब्त कर लो, आँख गर कमजोर हो।

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

A beautiful post... but looks like incomplete and posted in a haste. Is it so, Divya?

रंजन said...

कल अनामिका अम्बर को सुन रहा था.. बहुत खूबसूरत लाइन थी...

मैं तुझे जान लूँ.. तू मुझे जान ले..
मैं भी पहचान लूँ.. तू भी पहचान ले
है बहुत ही सरल प्रेम का व्याकरण..
तेरी मैं मान लूँ.. मेरी तू मान ले...

http://www.youtube.com/watch?v=Scm2E6eq5EM

Vijai Mathur said...

आपक आशय ठीक है इस विषय में कबीर ने भी लिखा है-

पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ,पंडित भयो न कोय
ढाई आखर प्रेम के जो पढ़े सो पंडित होय.

रहीम भी कहते हैं-

रहिमन धागा प्रेम का नो तोरो चटकाय
टूटे से फिर न मिले,मिले तो गाँठ परि जाय

shailendra said...

तुम कृष्ण मेरे , तुम राम मेरे ।
तुम ही हो , अभिमान मेरे ॥

antas se upji bhav....atisundar
shabd.....prarthana ka lay.....

ye kahne ki nahi ..... samjhne ki baat hai....

pranam.

प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI said...

प्रेम तो प्रेम है कहीं स्नेह है तो कहीं आसक्ति !
............कहीं एक तरफ़ा तो कहीं दो-तरफ़ा !!
....कुछ तो है ही ...जिसे हम भी समझने की कोशिश अब तक कर रहे हैं
......लेकिन अफ़सोस आता ही नहीं काबू में ?


...शायद इसीलिये हमारी पत्नी ने इशारों ही इशारों में कह दिया है .....प्रेम आपके बस का नहीं !!

Babli said...

बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण कविता लिखा है आपने! हर एक शब्द दिल को छू गयी! उम्दा प्रस्तुती!

डा. अरुणा कपूर. said...

बहुत सुंदर शब्दों मे...प्रेम की अनुभूति!....सुंदर रचना!

दिगम्बर नासवा said...

मेरे हिसाब से प्यार को परिभाषित या समझना दोनो ही आसान नही है ... जीतने लोग ... उतना ही अलग अलग तरह का प्यार ... प्यार बस प्यार है .... और प्यार है भी नही ... ये भी जिसको आप प्यार करते हो वही बता सकता है .... किसी के कहने से की मैं बहुत प्यार करता हूँ .... वो प्यार नही बन जाता .... ये तो मन से मन को समझने वाली बात है .... आपकी रचना बहुत लाजवाब है ....

sada said...

बहुत ही खूबसूरती से आपने व्‍यक्‍त किया है प्‍यार को,

कविता की हर पंक्ति भावमय, अनुपम प्रस्‍तुति ।

Mukesh Kumar Sinha said...

bahut sundar.........mujhe to lagta hai ILU pyar ke ahsaas ka vayvsaik roop hai......:)

विरेन्द्र सिंह चौहान said...

दिव्या जी ...
सबसे पहले तो इस बेहतरीन लेख के लिए
आपको आभार .
सच में प्यार को तो मैं भी नहीं समझ पाया हूँ .
लेकिन इतना ज़रूर लिखूँगा की प्यार के वगैर
ज़िन्दगी बेकार है ...
साथ ही हर एक रिश्ते में प्यार की
खुशबू अच्छी लगती है .
आपने अच्छी-अच्छी बातें लिखी हैं .
अभी एक -दो बार और पढूंगा .

ओशो रजनीश said...

-प्यार एक एहसास है।
-इस रिश्ते का कोई नाम नहीं होता। अनाम है ये रिश्ता।

सही कहा ...

यहाँ भी आये एवं कुछ कहे :-
समझे गायत्री मन्त्र का सही अर्थ

वन्दना said...

प्रेम तो वो दिव्य अनुभूति है जिसे शब्दो मे व्यक्त ही नही किया जा सकता और जिसे शब्दों मे बाँधा जा सके वो प्रेम नही……………प्रेम तो रस है जिस मे सिर्फ़ बहा जा सकता है मगर बाँधना संभव नही मगर डूबना संभव है…………प्रेम पर आज तक कितना लिखा गया और कितना लिखा जाता रहेगा मगर क्या कोई भी कभी पूरा पकड पाया…………नही ना……………फिर भी जिसने पकड लिया वो कह नही पाया क्योंकि शब्द वहाँ गौण हो जाते हैं।

डॉ टी एस दराल said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति ।
इतनी परिभाषाएं पढ़कर भी-- प्यार क्या होता है , यह आज तक कोई नहीं जान पाया।
शायद इसी अनबूझ पहेली का नाम प्यार है ।

बेचैन आत्मा said...

..प्रेम सदैव एक तरफ़ा ही होता है , जो चुप-चाप खामोश होकर अपने प्रिय को फलता-फूलता देखता है, और उसी कि मुस्कुराहटों में खुद को सफल हुआ मानता है।
..बहुत सुंदर!

VIJAY KUMAR VERMA said...

प्रेम कलि जो खिली थी उर में, उसकी उमर कुछ मॉस की थी।
प्रेम कि अग्नि पावन है, वो वजह नहीं उपहास की थी ॥
इस जगत में सब कुछ नश्वर है, ख़त्म तो एक दिन होना है ।
मीठी यादों का झरना जिसमें , वो मेरे उर का कोना है॥
तुम रचे वहां , तुम बसे वहां , तू सदा रहोगे पूज्य वहां।
मथुरा में रहो, गोकुल में रहो, उर में मेरे है धाम तेरा॥

तुम कृष्ण मेरे , तुम राम मेरे ।
तुम ही हो , अभिमान मेरे ॥

बहुत ही सुन्दर रचना ..वास्तव में प्रेम को परिभाषित नहीं किया जा सकता ..इसे तो केवल महसूस किया जा सकता है ..एक बार फिर से बहुत बधाई ...

Coral said...

व्वा क्या बात है....

anjana said...

लाजवाब रचना.

Happy Anant Chaturdashi
GANESH ki jyoti se noor miltahai
sbke dilon ko surur milta hai,
jobhi jaata hai GANESHA ke dwaar,
kuch na kuch zarror milta hai
“JAI SHREE GANESHA”

शोभना चौरे said...

दिव्याजी
प्रेम एक ऐसा शब्द ही जाने कितने लोगो ने इस पर लिखा है ,जाहिर है लिखा है तो इसलिए कि इसे महसूस किया है किसी न किसी रूप में हरेक के जीवन में कुछ क्षण प्रेम के आकर अलग अनुभूति दे गये है |ऑर जब आपने तार को
झंकृत किया है तो अपना भी कुछ लिखा याद आ गया |वैसे अतो आपने सारी अनुभूतिया प्रेम कि संजो दी है |फिर भी ॥
आकर्षण प्रेम कि पहली परिभाषा है
यह साथियों कि है मित्रो कि है
प्रेम में कोई रिश्ता नहीं होता
इसीलिए बंधन नहीं होता
प्रेम होता है निस्वार्थ
प्रेम होता है समर्पण
भले ही प्रेम एक सिरे से बंधा हों
दूसरा सिरा लहराता है स्वछंद
मानो कह रहा हों बंधा सिरा
मै तुम्हे बांधूंगा नहीं
मै तुम्हे सहारा देता रहूँगा
मुझको अपने प्रेम पर पूरा विश्वास है
तुम इसी तरह आकाश में लहराते रहो
मुझे ये अहसास है
कि तुम मेरे पास हों -------

M VERMA said...

प्यार अपरिभाषित है. प्यार सीमाओं से परे है. प्यार मूक होते हुए भी वाचाल है.
प्यार बस प्यार है

ashish said...

प्रेम एक भावना है जिसे हम महसूस करते है . दिव्य प्रेम अनुभूति , मनुष्य को नैसर्गिक शक्ति के करीब महसूस कराती है और मानव मन में नई स्फूर्ति का प्रजनन करती है .अति सुन्दर आलेख .

उन्मुक्त said...

मेरे विचार में प्रेम तो है बस विश्वास, इसे बांध कर रिशतों की दुहाई न दो

अजय कुमार said...

सुंदर व्याख्या ,अच्छी प्रस्तुति ।

डॉ. नूतन गैरोला " अमृता " said...

डॉ दिव्या !! बहुत दिल से लिखा और बहुत गहराई तक आपने प्रेम का विश्लेषण किया...कविता भी बहुत सुन्दर है... और प्रेमी में ही सभी भगवान् दिखाई दिए और और उससे ही अभिमान है.......ये एक सच्चे प्रेम की अनुभूति है... एक सुन्दर पोस्ट के लिए आपको बधाई ..

प्रकाश गोविन्द said...

मधु ‘मोहिनी’ जी का एक गीत है :

रूप को सिंगार दे तो जानिए वो प्यार है
रंग को निखार दे तो जानिए वो प्यार है
जीने की जो चाह दे तो जानिए वो प्यार है
ज़िंदगी को राह दे तो जानिए वो प्यार है
मोम-सा पिघल गया तो जानिए वो प्यार है
दर्द को निगल गया तो जानिए वो प्यार है
भावना को ज्वार दे तो जानिए वो प्यार है
*****************************
*****************************
आँख बोलने लगे तो जानिए वो प्यार है
भेद खोलने लगे तो जानिए वो प्यार है
बिन कहे सुनाई दे तो जानिए वो प्यार है
हो न हो दिखाई दे तो जानिए वो प्यार है
हो के दूर पास हो तो जानिए वो प्यार है
मन युँ ही उदास हो तो जानिए वो प्यार है
दर्द से उबार दे तो जानिए वो प्यार है


बहुत भावपूर्ण सुन्दर पोस्ट
आभार & शुभ कामनाएं

VICHAAR SHOONYA said...

मेरे लिए प्यार एक उलझाने वाला विषय है.
मैं अभी तक इसे समझ नहीं पाया हूँ.
समझू भी कैसे कभी भी किसी दुसरे को प्यार नहीं कर पाया.
जिसे भी प्यार किया वो अपना ही था.
अतः इस विषय पर क्या कह सकता हूँ.....

mahendra verma said...

प्यार के बारे में एक ख़याल यह भी है-
हमने देखी है इन आंखें की महकती खु़शबू
प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो
आपके विचार भी श्रेष्ठ हैं।

हेमंत कुमार ♠ Hemant Kumar said...

दिव्या जी,
बहुत सुन्दर और तार्किक ढंग से आपने प्रेम की विवेचना की है---प्रेम के बारे में तो बहुत कुछ लिखा गया है---लेकिन मुझे लगता है यह एक ऐसा अहसास है जो व्यक्ति को दो पैरों वाले जीव से बदल कर मनुष्य का रूप प्रदान करता है। बेहतरीन पोस्ट।

anshumala said...

प्यार की परिभाषा सभी के लिए अलग है जो जीवन को जिस तरह लेता है प्यार को भी उसी तरह समझता है जैसे कोई हल्के में तो कोई गंभीरता से |

Saba Akbar said...

मेरी आज पढ़ी हुई सबसे बेहतरीन और खूबसूरत पोस्ट...

संगीता पुरी said...

बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण रचना !!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सुन्दर व्याख्या और उतनी ही अच्छी कविता ....

amarhindi said...


Here is my WORDLESS comment, feel it or deny it.. no matter !

राजभाषा हिंदी said...

प्रेमचंद ने कहा था सच्चा प्रेम संयोग में भी वियोग की मधुर वेदना का अनुभव भी करता है और साथ ही प्यार का....। बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
अलाउद्दीन के शासनकाल में सस्‍ता भारत-2, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

Manish said...

अरे! यहाँ तो अपनी ही टॉपिक चल रही है :P कुछ दिन में मैं अपना भी अनुभव लिखने वाला हूँ… वो क्या है कि अभी भी ऐसी बाते करने में शर्म आती है… यहीं से शुरु होती है जी ये रिश्ता… "प्यार का"

क्या कभी सुना है… दो बेशर्मों मे बीच प्यार पनपते हुए? पनप भी गया तो बबूल पनपेगा… वो खुशबू नही मिल पाती है जो उन अनोखों भावों में होती है…

मुझसे बड़े चैम्पियन लोग भरे पड़े है ब्लॉग जगत में… उनसे उनकी राय लेना ठीक रहेगा :P

'उदय' said...

... bahut sundar !!!

ethereal_infinia said...

Dearest ZEAL:

While it would be seemingly incorrect, but still I would prefer to begin with a disagreement as I go on to state that –

Love is never one-sided.

Love thrives on reciprocal terms only.

An one-sided love has only 2 ends and both are dismal in their terminality.

Either it ends in the acrimonious ‘grapes are sour’ bickering or the continual inattention leads it to veer off into inconsequence and thereby oblivion.

One-sided love is merely a passing infatuation which doesn’t stand the test of time and withers away at the sight of the next delectable attention-drawer.

Love blooms only when there is knowledge in the heart that whatever be the state of affairs, there is love in the beloved’s heart and the feelings are mutual and continual.

The cornerstone of love is Faith!

Ably accompanied by unwavering Hope, Faith becomes the pillar of love’s endearing edifice.

The feeling of Love transcends everything else in importance and there is a constant desire to be with the beloved – be it in person or be it in thoughts.

All distances of time and space stand vanquished as love traverses to the beloved to convey wordlessly – “I Love You” each time the name comes to mind.

Jab kabhi teraa naam lete hain
Hum mohabbat se kaam lete hain

The trials and tribulations of Love are instruments of God to vet the trueness of the tenacity and commitment of the lovers to their love and unto each other. Thereon Ghalib renders –

Khastagi kaa tum se kyaa shikwaa ke ye
Hathkande hain charkh-e-nili_faam ke

[Khastagi = Injury, Hathkande = Tactics / Instrumentalities,
Charkh-E-Nili_faam = Blue Sky / Heavens]

And on a beautiful note, Ghalib gives a rejoinder –

Khat likhenge garche matlab kuchh naa ho
Hum to hain aashiq tere naam ke

And the passion to continually keep conversing with the beloved makes one wish that –

Magar likhwaaye koi usko khat to humse likhwaaye
Huee subah aur ghar se kaan par rakh kar kalam nikle

Zaraa kar kor sine par ki teer-e-pursitam nikle
Jo woh nikle to dil nikle, jo dil nikle to dam nikle

[Teer-E-Pursitam = The Arrow Of Cupid]

It is not love which falters. It is not love which gives up. It is not love which doubts.

As you rightly said, Love Never Dies.

Here I pause with a tribute to you –

Aankho ki baat nikli to dekhi tasveer zeal ki
‘Aah’ sametay rakhi, baat rahi dil mein dil ki

Kis qadar kare bayaan wo nazaaraa-e-jannat
Dilrubaa! Dekh aayaa taasir jo teri mehfil ki
[Taasir = Effect / Impression]

Mutaa’asif ishq main husn-e-jaanaa tere
Bandagi mein apni har baat ab tabdeel ki
[Mutaa’asif = Grieving, Bandagi = Prayer, Tabdeel = Alter]

Gul sabhi denge, lo pesh-e-khidmat banaafshaa
Kabr par rahegi alag nishaani mere qaatil ki
[Gul = rose, Banaafshaa = violet]

Ru-ba-ru woh ho aur phir ‘Arth’ teri khaamoshi
Kyaa khudaa banaayegaa aur ghadi muskil ki!!


Arth Desai

Manish said...

मेरे शब्द नज़र अन्ही आये… अफसोस हुआ!! जरा चुलबुला किस्म का दिमाग है…

प्यार की परिभाषा अभी तक समझ नही आयी है… आपने जो लिखा उस पर विचार करेंगे…

संजय भास्कर said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

ZEAL said...

.

Manish ji,

I was not online at that time and hence the delay in publishing. I apologize for the inadvertent error.

.

Poorviya said...

radha ka bhee shya
wo to meera ka bhee shyam

ajit gupta said...

प्रेम, प्‍यार और ममता। तीनों का ही सम्‍बंध केवल दिल से है। हम माता-पिता, भाई-बहन आदि निकटस्‍थ रिश्‍तों से प्रेम करते हैं, जो शाश्‍वत हैं। अपनी संतान के साथ ममता रखते हैं जिसका सम्‍बंध आत्‍मीय है और प्‍यार तो शारीरिक आकर्षण है जो कभी भी पलक झपकते ही किसी के साथ हो सकता है, यह जितनी जल्‍दी होता है उतनी ही शीघ्रता से समाप्‍त भी हो सकता है।

Kailash C Sharma said...

इतने विस्तृत प्यार के विश्लेषण के बाद प्यार के बारे में कहने को और कुछ बचा ही क्या है.......लेकिन आजकल इतना सच्चा और सात्विक प्यार दिखाई कहाँ देता है.....

ZEAL said...

.

@-- but looks like incomplete and posted in a haste। Is it so, Divya?

निशांत जी,

प्यार में जब भी कोई पोस्ट लिखी जायेगी तो वो अधूरी ही लगेगी। क्यूंकि, प्यार एक एहसास है। सिर्फ महसूस किया जा सकता है। शब्दों में पूरी तरह बयान नहीं किया जा सकता। प्यार होता है , इसके लिए कोई वैज्ञानिक प्रमाण या साक्ष्य भी नहीं होते। प्यार को सिर्फ वही महसूस कर सकता है जो प्यार करता है। यहाँ तक कि, जिसे प्यार किया जा रहा है वो भी इस अनुपम उपहार का मोल अक्सर नहीं समझता।

लेकिन यहाँ सभी पाठकों ने जिस तरह अपने एहसास बांटे हैं, उसके बाद तो ये पोस्ट अधूरी नहीं लग रही अब...

.

ZEAL said...

.

@--हमने देखी है इन आंखें की महकती खु़शबू
प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो....

महेंद्र वर्मा जी,

इस परिभाषा से कभी हद तक सहमत हूँ। प्रेम वही है आखों को देखकर न सिर्फ तृप्त हो जाए बल्कि एक और ज्ञानेन्द्रिय को उद्वेलित करके आँखों में महेकती खुशबू को महसूस करा दे।

एक पंक्ति है...

" तेरे आने कि जब खबर पहुंचे, तेरी खुशबू से सारा घर महके। "

यहाँ भी प्रिय के आने कि ख़ुशी में पल-पल इंतज़ार कितना मीठा हो गया है , और घर-आँगन खुशबू से महक रहा है। शायद कोकिलें भी गुन्जायेमान हों... यानी प्रेम में पांचो इन्द्रियां तथा उभ्येंद्रिय-मन मिलकर अपने प्रिय को महसूस कर रहे हैं।


.

ZEAL said...

.

अर्थ देसाई जी,

आपकी बहुत सी बातों से सहमत हूँ । प्यार दो-तरफ़ा संभव है लेकिन होता नहीं है। दो-तरफा प्यार की उम्र बहुत छोटी होती है।

इसलिए यही कहूँगी की प्यार सिर्फ एक तरफ़ा ही होता है , जो बिना किसी अपेक्षा के , बिना लज्जित हुए , अपनी पूरी उम्र जीता है। जो सच्चा प्रेम करते हैं वो तो अपने प्रेम की भनक भी नहीं लगने देते। अपने प्रिय को बताकर वो उसके मन में भय और अपेक्षा पैदा कर देते हैं। वो असहज हो उठता है। और डर जाता है। भय के कारण आपसे दूर भागने लगता है , और अपेक्षा के चलते कुछ नादानियाँ भी कर बैठता है।

क्यूंकि जिसे हम प्यार करते हैं, वो जरूरी नहीं हमारे लिए भी वही भावनाएं रखता हो। इसलिए अपने प्रेम को अकेले ही जीना चाहिए, और अपने प्रिय को प्रेम के बंधनों से मुक्त रखना चाहिए।

बंधन कैसा भी हो, मनुष्य की स्वतंत्रता तो छीन ही लेता है। इसलिए प्रेम की पवित्रता और निस्वार्थता एक-तरफ़ा होने में ही है।

.

ZEAL said...

.

@--One-sided love is merely a passing infatuation which doesn’t stand the test of time and withers away at the sight of the next delectable attention-drawer....

Crush or infatuation is related with attraction. It could be mental or physical . It definitely doesn't last long . This kind of love existing between a man and a woman is an example of " shringar ras " .

But I am talking of love beyond these momentary attractions. The love I mentioned here is something platonic , spiritual and without expectations from the beloved.

Love is a matter of heart and soul. But unfortunately people start intellectualizing it.

This divine , spiritual and unconditional love is experienced and felt by SOUL only.

.

राजकुमार सोनी said...

प्यार सिर्फ शब्द ही नहीं है
नया अर्थ देने की आपकी कोशिश शानदार है
मेरी बधाई स्वीकारें

ZEAL said...

.

अजित गुप्ता जी,

शारीरिक आकर्षण निश्चय ही अल्पायु होता है । लेकिन यदि प्यार किसी को बिना देखे , उसे पढ़कर हो जाए तो ?

माँ-बाप , भाई-बहिन , पुत्र-पुत्री का रिश्ता तो दायित्वों का रिश्ता है। हर कोई निभा ही लेता है । इन रिश्तों में अपेक्षा और परस्पर निर्भरता होती है। लेकिन सात्विक निश्छल प्रेम जो एक स्त्री और पुरुष के बीच होता है , उसमें कोई अपक्षा नहीं , दायित्व नहीं और किसी प्रकार का बंधन नहीं होता।

इस प्रेम में मिलन की भी जरूरत नहीं। इसे सिर्फ आत्मा महसूस करती है।

कभी रोती है....कभी मुस्कुराती है....कभी छटपटाती है....

बिना अग्नि के सात फेरों के वो एकरूप हो जाती है।

.

G Vishwanath said...

दिल, विल, प्यार व्यार,
(अब इस उम्र में) मैं क्या जानूं रे!

Just kidding.
Ggood post.
Keep writing
Regards
जी विश्वनाथ

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
आभार, आंच पर विशेष प्रस्तुति, आचार्य परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पधारिए!

अलाउद्दीन के शासनकाल में सस्‍ता भारत-2, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

Vijay Pratap Singh Rajput said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

सम्वेदना के स्वर said...

निःशब्द करती पोस्ट!!

दीर्घतमा said...

प्यार जो अंतर्मन ही जानता है ,करता है भाव ब्यक्त नही होता
आपने बहुत अच्छे प्रकार से सजोया.
बहुत-बहुत धन्यवाद.

सुधीर said...

सुंदर प्रस्तुति

ethereal_infinia said...

Dearest ZEAL:

I start at the very point you paused.

Love is experienced and felt by Soul.

In fact, Love is a Marriage of Souls. Ergo, as it is said, it takes two to tango.

In an one-sided incident, for one the acquaintance is merely cursory and the other lives on in a world of stark illusion. And illusions do not last cause they are non-existential.

One-sided ‘love’ can very well take this Meer couplet as very befitting:

Hasti apni hubaab ki si hain
Yeh numaaish saraab ki si hain

[Hubaab = Bubble, Saraab = Illusion / Mirage]

Not only one-sided, even if there was a feeling of ‘love’ at one point and if it perishes, such an instance too can never be deemed as love. Because Love is eternal and only when it is true from both sides, it lives on, even beyond the life-times of the lovers.

It can be said there is Love between two only when both of them are feeling alike and keep doing so, till the very end.

Since I am practically zero on spirituality [being a hard-core materialist] and barely aware of the nine ‘ras’, I will not be able to say much in those regards.

You spoke of bondage in love and I speak of Love as a Bond. A subtle difference which changes the fabric of mention altogether. Even if I buy the term ‘bondage’, it would be in this fashion:

Gar siyaahbakht hi honaa thaa naseebo mein mere
Zulf hotaa tere rukhsaar pe yaa til hotaa

[Siyaahbakht = Bound In Chains]

Therein too, it needs two!

Without consummate reciprocation, one-sided ‘incident’ is merely an attraction, a liking and that shall never mature into love.

Love takes two people to the zenith of unification which is beautifully expressed thus

Main nahi, tu hain, tu nahi main hoon
Ab kuchh aisaa gumaan hain, Pyaari

Concluding this comment, I would only say that we both have our thoughts and so it be.

Ishq ki daastaan hain, Pyaari
Apni-apni zabaan hain, Pyaari


Arth Desai

ZEAL said...

.

@- Arth Desai-

Love is not a domain of materialistic and practical people.

To understand love , a bit of spirituality is indeed required.

.

निर्मला कपिला said...

प्यार में पीड़ा [वेदना ] तीव्रतम होती है , इस वेदना का सुख भी स्वर्गिक होता है।
दिव्या हैरान हूँ इस उम्र मे इतना दिव्य ग्यान? सही बात है जो आई लव यू कहते हैं वो प्यार का अर्थ जानते ही नही प्यार तो केवल महसूस किया जाता है और बिन कहे ही समझा जाता है। शारीरिक प्यार प्यार नही होता केवल आपेक्षायें होती हैं नही तो वैवाहिक बन्धन मे कभी दरार आती ही नही। प्यार केवल त्याग माँगता है न कि शब्द। बहुत अच्छी लगी ये पोस्ट। बधाई।

डॉ. मोनिका शर्मा said...

लाजवाब रचना.....बधाई

भारतीय की कलम से.... said...

नमस्कार !!
वाकई प्यार के रिश्ते को आपने बेहद सुन्दरता के साथ इस पोस्ट में समाहित किया है, मै इस विषय में अंजान हूँ अतः आपको केवल बधाई ही दे सकता हूँ.........इस बेहद प्रभावी पोस्ट के लिए मेरी बधाई स्वीकार करें !!

mastkalandr said...

Love is a journey not a destination..,love is not something you want to feel,it is something you feel without wanting..
ख़ूबसूरत और प्रभावशाली लेख..,शब्द ह्रदय को छूते हुए आत्मा तक पहुच गए.
तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ ,एक नगमा याद आया भेज रहा हूँ फुरसत से सुनियेगा.. मक्
My recent youtube upload
http://www.youtube.com/watch?v=1__w3KG3xhY

http://www.youtube.com/mastkalandr
http://www.youtube.com/9431885

मीनाक्षी said...

नमस्कार..पहली बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ.... प्रेम जैसे पवित्र एहसास पर लिखी पोस्ट ने जितना मुग्ध किया .. टिप्पणियों के जवाब में आपके भावों ने मन को मोह लिया...
"अपने प्रेम को अकेले ही जीना चाहिए, और अपने प्रिय को प्रेम के बंधनों से मुक्त रखना चाहिए।" -- यही भाव प्रेम के एहसास को खूबसूरत बना देता है...

manu said...

इतनी बार हुआ है....

पर कभी कभी लगता है जैसे कभी नहीं हुआ...

shyam1950 said...

दिव्या, आपके समग्र लेखन में सर्वश्रेष्ठ यह पोस्ट ...लगता है समुद्र मंथन से अमृत के प्रकट होने की बारी है .स्वागत है ...लेकिन, एक बात.. प्रेम एक दो या तीन से नहीं होता.. यह तो आपका स्वभाव ही होता है..इसलिए निभाने न निभाने का भी कोई प्रश्न नहीं उठता.. यह तो सबके प्रति समान-भाव से प्रेम-मय होता है..
दूसरी बात फकीर और कवि आवारा बादल होते हैं आज हैं कल नहीं कल फिर चले आयेंगे.. मौजी जीव होते हैं इन के लिए दिल में शिकायतें नहीं पलनी चाहिए..इतनी लंबी टिप्पणियों की ट्रेन लांघ कर टिप्पणी देने के लिए आना मेरे जैसे महान आलसियों के बस में नहीं होता . .. लेकिन आज की इस पोस्ट ने तो लगभग बाध्य ही कर दिया ..सो ..

अनुपमा पाठक said...

sundar post!
regards,

डॉ महेश सिन्हा said...

हमने देखि है उन आँखों की महकती खुशबू ..........

shyam1950 said...

वाह ! दिव्या, वाह! तुम्हारा सारा ब्लॉग कोयले की खदान और यह पोस्ट..कोहेनूर!! कोहेनूर!! कोहेनूर !! आज तो जी करता है तुम्हें तुम्हीं से चुरा लिया जाये! वाह! अद्वैत के इस परम भाव की तो झलक ही मिल जाये किसी को तो उसका तो जीवन कृतकृत्य हो जाता है .. प्यार इक तरफा ही होता है.. समरस, शांत, निर्भय, निर्द्वन्द्व, अपनी ही मस्ती में मस्त ..न इसे कुछ देना होता है न इसे कुछ लेना होता है ..बस होता है और जो भी इसके घेरे में पहुँच जाये, वह भी मस्त हो जाता है ..याद है! आपकी सहेली ETHREAL इन टिप्पणियों में ठीक वही बातें दुहरा रही हैं जो कभी आपने अपनी जिज्ञासा में कही थीं .. अब मुझसे यह मत कहना की मैं ज्यादा तारीफें क्यों करता हूँ .. जब भी कोई ऐसा जाम मेरे सामने रख दे तो बहकना न बहकना मेरे बस में नहीं रहता.. मैं क्या करू? आज तक मैं आपके ब्लॉग पर आता था बिना टिप्पणी के ही निकल जाता था, लेकिन जौहरी को जब हीरे की झलक मिल जाये तो कैसे छोड़ दे ? हीरा कोयले की खदान में ही मिलता है यह तथ्य भी आपसे अबूझ नहीं है .. कमल कीचड में ही खिलता है इसलिए कीचड का भी तिरस्कार नहीं करना चाहिए! निर्वैर हो पाना ही प्रेम में होना है..चल अब चुप कर बातूनी आदमी ..

Priya said...

What Divya is talking about is 'RISING IN LOVE' and not 'falling in love'.
falling in love' is a Western thought.

RISING IN LOVE' is Bhartiya expression
Congrats Divya for showing the true face of love.

"Love blooms only when there is knowledge in the heart that whatever be the state of affairs, there is love in the beloved’s heart and the feelings are mutual and continual.---Arth Desai"

IT is a TRUTH. Blooming occurs only if at least once you come across the knowledge of existence of a similar feeling in beloved's heart.

"But I am talking of love beyond these momentary attractions. The love I mentioned here is something platonic , spiritual and without expectations from the beloved.--ZEAL"

Very Correct Divya ji, These are higher levels and you will reach them only after climbing the initial stairs. Everybody knows what the initial stairs are. When the macro (initial stairs) turns into micro (subtle) the feeling of love becomes imbibed in us and it becomes eternal and ultimately we no longer feel it. In the penultimate stage we have only one feeling - the fear of loss of beloved.

Tulsi loved and died for Sri Krishna. Lord came to know after her death only. Now see the effect. None of the puja of Lord Vishnu, Krishna, Rama is complete without Tulsi. LOVE IS MAGNIFICENT. and therefore Hanuman loves Tulsi as mother and his apetite never satiates without having tulsipatra in his food.


"मधु ‘मोहिनी’ जी का एक गीत है :
prakash govind---
रूप को सिंगार दे तो जानिए वो प्यार है
रंग को निखार दे तो जानिए वो प्यार है
जीने की जो चाह दे तो जानिए वो प्यार है
ज़िंदगी को राह दे तो जानिए वो प्यार है
मोम-सा पिघल गया तो जानिए वो प्यार है
दर्द को निगल गया तो जानिए वो प्यार है
भावना को ज्वार दे तो जानिए वो प्यार है
*****************************
*****************************
आँख बोलने लगे तो जानिए वो प्यार है
भेद खोलने लगे तो जानिए वो प्यार है
बिन कहे सुनाई दे तो जानिए वो प्यार है
हो न हो दिखाई दे तो जानिए वो प्यार है
हो के दूर पास हो तो जानिए वो प्यार है
मन युँ ही उदास हो तो जानिए वो प्यार है
दर्द से उबार दे तो जानिए वो प्यार है "
Bahut sundar abhivyakti.

No doubt you feel like living only when you love someone or something.
Thanks for stirring us.

ZEAL said...

.
प्रिया जी,

अचंभित हूँ आपकी गहरी अन्वेषक दृष्टि से। आपने यहाँ अपने विचार रखे इसके लिए मन अति-पुलकित है।

तुलसी-कृष्ण और हनुमान प्रकरण का जो जिक्र आपने किया वो मेरे लिए सर्वथा नवीन है। इस प्रकरण से लेख की सार्थकता बढ़ गयी । आपके यहाँ आने और अपने विचारों को रखने किये लिए बहुत आभार।

.

ZEAL said...

.
आप सभी को यह पोस्ट बहुत पसंद आई , इसके लिए मन बहुत प्रसन्न है।

सभी पाठकों के बहुमूल्य विचारों से मेरा जो ज्ञानार्जन हुआ है उसके लिए आप सभी का ह्रदय से आभार।

.

Jagan Ramamoorthy said...

Very astutely felt and written post on the MOST difficult topic, here. "Love" is NOT so easy to define by any means, not even by the greatest of Lovers. Congrats Divya, for such a wonderful article. But, I must confess or say "This post is for 1% of the entire world's population to understand" -- 99% can't imagine about this, since they have no clue.

I specially liked the last part -- the small poem. Very well written indeed.

Anonymous said...

For hottest information you have to visit world wide web and
on web I found this site as a best website for newest updates.


my weblog - will ficken