Saturday, November 5, 2016

Freedom of expression? or freedom of crime?

सबको आजादी चाहिए ! अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में देशद्रोह , दुश्मन मुल्कों को ख़ुफ़िया एवम संवेदनशील जानकारियों का दिया जाना , किसी को बलात्कार की आजादी चाहिए , किसी को राशन कार्ड की आजादी चाहिए ! किसी को पटरी उखाड़ने की आजादी तो किसी बसें फूंकने की आजादी चाहिए !किसी को तीन तलाक की आजादी चाहिए तो किसी को इंशा अल्लाह देश के टुकड़े करने की आजादी चाहिए ! संसाधनों और बुद्धि का इतना दुरूपयोग अन्यत्र कहीं नहीं देखा ! अभिव्यक्ति कि आजादी ? या हरकतबाजियों की आजादी ?

Friday, May 20, 2016

प्रधानमंत्री मोदी जी के नाम पत्र

परमप्रिय/आदरणीय प्रधानमंत्री जी,
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आपके कार्यकाल के दो वर्ष पूरे होने पर आपका हार्दिक अभिनन्दन एवं बधाई । आप स्वस्थ एवं दीर्घायु हों तथा अपनी जनता की सेवा इसी प्रकार करते रहें । आपका बहुत-बहुत आभार की आप हमारे द्वारा लिखी गयी पोस्टों पर निरंतर अपनी पैनी दृष्टि बनाये रखते हैं और उन्हें संज्ञान में भी लेते हैं । पिछले दो वर्षों में मैंने आपसे जिन मुद्दों पर भी निवेदन किया आपने उन्हें तत्काल संज्ञान में लेकर उन्हें समय रहते दुरुस्त भी किया है । कुछ बहुत अहम् मुद्दों पर जहाँ आपसे चूक हो रही थी , उन्हें भी आपने हमारी पोस्टों द्वारा निवेदन किये जाने का सम्मान करते हुए सुधारा । हमारा एक निवेदन जो हम पिछली सरकार के समय से निरन्तर कर रह थेे कि आयुर्वेद को उसकी प्रतिष्ठा वापस दी जाए , आपने उस पर भी ध्यान दिया है । आपका ह्रदय से आभार की आप हमारे द्वारा लिखी गयी खरी-खरी एवं कड़वी पोस्टों को दवाई समझ पी जाते हैं और बदले में हमें (जनता को) अमृत देते हैं । हम अपने मित्रों समेत आपका सादर आभार व्यक्त करते हैं ।
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आज आपसे पुनः एक अहम् निवेदन कर रही हूँ की भारत से जातिवाद और आरक्षण सदैव के लिए समाप्त कर दिया जाए । किसी के नाम के आगे कोई जाति न लिखी हो । सिर्फ नाम ही उसकी पहचान हो । न जाती होगी, न ही जातिगत आरक्षण , न कोई क्लेश , न ही किसी के मन में किसी प्रकार का असंतोष होगा । सभी को सामान अवसर मिलेंगे । प्रतिभाएं फलेंगी फूलेगी । देश का सच्चे अर्थों में विकास होगा । सबका साथ, सबका विकास होगा ।
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आपने दो वर्षों में तकरीबन सभी अहम् कार्य पूरे कर दिखाए हैं , सिवाए दो कामों के । एक आरक्षण हटाना और दूसरा काम उससे भी अहम् अभी शेष है । कृपया हमारे इस निवेदन को संज्ञान में लेकर इस पर शीघ्रातिशीघ्र कदम उठाये जाएँ और आरक्षण समाप्त किया जाए । तभी बुलेट ट्रेन आने की ख़ुशी हम सच्चे अर्थों में मना पाएंगे ।
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सादर,
आपकी शुभेच्छु,
दिव्या
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(हमारे जो मित्र आरक्षण के खिलाफ हैं , वे कृपया इस पोस्ट को शेयर कर हमारा सहयोग करें । सादर आभार )

Sunday, March 13, 2016

मनुवाद क्या है और क्या है मनुस्मृति।

मनु महराज कहते हैं- :
जन्मना जायते शूद्र: कर्मणा द्विज उच्यते।
अर्थात जन्म से सभी शूद्र होते हैं और कर्म से ही वे
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बनते हैं। वर्तमान दौर में
‘मनुवाद’ शब्द को नकारात्मक अर्थों में लिया जा रहा है।
ब्राह्मणवाद को भी मनुवाद के ही पर्यायवाची के रूप
में उपयोग किया जाता है। वास्तविकता में तो मनुवाद
की रट लगाने वाले लोग मनु अथवा मनुस्मृति के बारे में
जानते ही नहीं है या फिर अपने निहित स्वार्थों के लिए
मनुवाद का राग अलापते रहते हैं। दरअसल, जिस जाति
व्यवस्था के लिए मनुस्मृति को दोषी ठहराया जाता है,
उसमें जातिवाद का उल्लेख तक नहीं है।
क्या है मनुवाद :
जब हम बार-बार मनुवाद शब्द सुनते हैं तो हमारे मन में भी
सवाल कौंधता है कि आखिर यह मनुवाद है क्या?
महर्षि मनु मानव संविधान के प्रथम प्रवक्ता और आदि
शासक माने जाते हैं।
मनु की संतान होने के कारण ही मनुष्यों को मानव या
मनुष्य कहा जाता है।
अर्थात मनु की संतान ही मनुष्य है। सृष्टि के सभी
प्राणियों में एकमात्र मनुष्य ही है जिसे विचारशक्ति
प्राप्त है। मनु ने मनुस्मृति में समाज संचालन के लिए जो
व्यवस्थाएं दी हैं, उसे ही सकारात्मक अर्थों में मनुवाद
कहा जा सकता है।
मनुस्मृति : समाज के संचालन के लिए जो व्यवस्थाएं दी हैं,
उन सबका संग्रह मनुस्मृति में है।
अर्थात मनुस्मृति मानव समाज का प्रथम संविधान है,
न्याय व्यवस्था का शास्त्र है।
यह वेदों के अनुकूल है। वेद की कानून व्यवस्था अथवा न्याय
व्यवस्था को कर्तव्य व्यवस्था भी कहा गया है।
उसी के आधार पर मनु ने सरल भाषा में मनुस्मृति का
निर्माण किया। वैदिक दर्शन में संविधान या कानून का
नाम ही धर्मशास्त्र है।
महर्षि मनु कहते है- धर्मो रक्षति रक्षित: । अर्थात जो
धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। यदि
वर्तमान संदर्भ में कहें तो जो कानून की रक्षा करता है
कानून उसकी रक्षा करता है। कानून सबके लिए अनिवार्य
तथा समान होता है।
जिन्हें हम वर्तमान समय में धर्म कहते हैं दरअसल वे संप्रदाय हैं।
धर्म का अर्थ है जिसको धारण किया जाता है और मनुष्य
का धारक तत्व है मनुष्यता, मानवता।
मानवता ही मनुष्य का एकमात्र धर्म है। मुस्लिम,
ईसाई, बौद्ध, सिख आदि धर्म नहीं मत हैं, संप्रदाय हैं ।
संस्कृत के धर्म शब्द का पर्यायवाची संसार की अन्य
किसी भाषा में नहीं है। भ्रांतिवश अंग्रेजी के ‘रिलीजन’
शब्द को ही धर्म मान लिया गया है, जो कि नितांत
गलत है। इसका सही अर्थ संप्रदाय है। धर्म के निकट यदि
अंग्रेजी का कोई शब्द लिया जाए तो वह ‘ड्यूटी’ हो
सकता है। कानून ड्यूटी यानी कर्तव्य की बात करता है।
मनु ने भी कर्तव्य पालन पर सर्वाधिक बल दिया है। उसी
कर्तव्यशास्त्र का नाम मानव धर्मशास्त्र या मनुस्मृति
है।
आजकल अधिकारों की बात ज्यादा की जाती है,
कर्तव्यों की बात कोई नहीं करता। इसीलिए समाज में
विसंगतियां देखने को मिलती हैं।
मनुस्मृति के आधार पर ही आगे चलकर महर्षि
याज्ञवल्क्य ने भी धर्मशास्त्र का निर्माण किया
जिसे याज्ञवल्क्य स्मृति के नाम से जाना जाता है।
अंग्रेजी काल में भी भारत की कानून व्यवस्था का मूल
आधार मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति रहा है। कानून
के विद्यार्थी इसे भली-भांति जानते हैं। राजस्थान
हाईकोर्ट में मनु की प्रतिमा भी स्थापित है।
मनुस्मृति में दलित विरोध :
मनुस्मृति न तो दलित विरोधी है और न ही ब्राह्मणवाद
को बढ़ावा देती है। यह सिर्फ मानवता की बात करती है
और मानवीय कर्तव्यों की बात करती है। मनु किसी को
दलित नहीं मानते।
दलित संबंधी व्यवस्थाएं तो अंग्रेजों और आधुनिकवादियों
की देन हैं। दलित शब्द प्राचीन संस्कृति में है ही नहीं। चार
वर्ण जाति न होकर मनुष्य की चार श्रेणियां हैं, जो पूरी
तरह उसकी योग्यता पर आधारित है।
प्रथम ब्राह्मण, द्वितीय क्षत्रिय, तृतीय वैश्य और चतुर्थ
शूद्र। वर्तमान संदर्भ में भी यदि हम देखें तो शासन-प्रशासन
को संचालन के लिए लोगों को चार श्रेणियों- प्रथम,
द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ श्रेणी में बांटा गया है।
मनु की व्यवस्था के अनुसार हम प्रथम श्रेणी को ब्राह्मण,
द्वितीय को क्षत्रिय, तृतीय को वैश्य और चतुर्थ को शूद्र
की श्रेणी में रख सकते हैं। जन्म के आधार पर फिर उसकी
जाति कोई भी हो सकती है। मनुस्मृति एक ही मनुष्य
जाति को मानती है। उस मनुष्य जाति के दो भेद हैं। वे हैं
पुरुष और स्त्री।
मनु कहते हैं- ‘जन्मना जायते शूद्र:’
अर्थात जन्म से तो सभी मनुष्य शूद्र के रूप में ही पैदा होते
हैं। बाद में योग्यता के आधार पर ही व्यक्ति ब्राह्मण,
क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र बनता है।
मनु की व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण की संतान यदि
अयोग्य है तो वह अपनी योग्यता के अनुसार चतुर्थ श्रेणी
या शूद्र बन जाती है। ऐसे ही चतुर्थ श्रेणी अथवा शूद्र की
संतान योग्यता के आधार पर प्रथम श्रेणी अथवा ब्राह्मण
बन सकती है।
हमारे प्राचीन समाज में ऐसे कई उदाहरण है, जब व्यक्ति
शूद्र से ब्राह्मण बना। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के गुरु
वशिष्ठ महाशूद्र चांडाल की संतान थे, लेकिन अपनी
योग्यता के बल पर वे ब्रह्मर्षि बने।
एक मछुआ (निषाद) मां की संतान व्यास महर्षि व्यास
बने। आज भी कथा-भागवत शुरू होने से पहले व्यास पीठ
पूजन की परंपरा है।
विश्वामित्र अपनी योग्यता से क्षत्रिय से ब्रह्मर्षि बने।
ऐसे और भी कई उदाहरण हमारे ग्रंथों में मौजूद हैं, जिनसे इन
आरोपों का स्वत: ही खंडन होता है कि मनु दलित
विरोधी थे।
ब्राह्मणोsस्य मुखमासीद् बाहु राजन्य कृत:।
उरु तदस्य यद्वैश्य: पद्भ्यां शूद्रो अजायत। (ऋग्वेद)
अर्थात ब्राह्णों की उत्पत्ति ब्रह्मा के मुख से, भुजाओं से
क्षत्रिय, उदर से वैश्य तथा पांवों से शूद्रों की उत्पत्ति
हुई।
दरअसल, कुछ अंग्रेजों या अन्य लोगों के गलत भाष्य के
कारण शूद्रों को पैरों से उत्पन्न बताने के कारण निकृष्ट
मान लिया गया, जबकि हकीकत में पांव श्रम का प्रतीक
हैं।
ब्रह्मा के मुख से पैदा होने से तात्पर्य ऐसे व्यक्ति या समूह
से है जिसका कार्य बुद्धि से संबंधित है अर्थात अध्ययन
और अध्यापन।
आज के बुद्धिजीवी वर्ग को हम इस श्रेणी में रख सकते हैं।
भुजा से उत्पन्न क्षत्रिय वर्ण अर्थात आज का रक्षक वर्ग
या सुरक्षाबलों में कार्यरत व्यक्ति। उदर से पैदा हुआ वैश्य
अर्थात उत्पादक या व्यापारी वर्ग। अंत में चरणों से
उत्पन्न शूद्र वर्ग।
यहां यह देखने और समझने की जरूरत है कि पांवों से उत्पन्न
होने के कारण इस वर्ग को अपवित्र या निकृष्ट बताने की
साजिश की गई है, जबकि मनु के अनुसार यह ऐसा वर्ग है
जो न तो बुद्धि का उपयोग कर सकता है, न ही उसके शरीर
में पर्याप्त बल है और व्यापार कर्म करने में भी वह सक्षम
नहीं है। ऐसे में वह सेवा कार्य अथवा श्रमिक के रूप में कार्य
कर समाज में अपने योगदान दे सकता है।
आज का श्रमिक वर्ग अथवा चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी मनु
की व्यवस्था के अनुसार शूद्र ही है। चाहे वह फिर किसी
भी जाति या वर्ण का क्यों न हो।
वर्ण विभाजन को शरीर के अंगों को माध्यम से समझाने
का उद्देश्य उसकी उपयोगिता या महत्व बताना है न कि
किसी एक को श्रेष्ठ अथवा दूसरे को निकृष्ट। क्योंकि
शरीर का हर अंग एक दूसरे पर आश्रित है। पैरों को शरीर से
अलग कर क्या एक स्वस्थ शरीर की कल्पना की जा
सकती है? इसी तरह चतुर्वर्ण के बिना स्वस्थ समाज की
कल्पना भी नहीं की जा सकती।
ब्राह्मणवाद की हकीकत :
ब्राह्मणवाद मनु की देन नहीं है। इसके लिए कुछ निहित
स्वार्थी तत्व ही जिम्मेदार हैं। प्राचीन काल में भी ऐसे
लोग रहे होंगे जिन्होंने अपनी अयोग्य संतानों को अपने
जैसा बनाए रखने अथवा उन्हें आगे बढ़ाने के लिए लिए अपने
अधिकारों का गलत इस्तेमाल किया होगा। वर्तमान
संदर्भ में व्यापम घोटाला इसका सटीक उदाहरण हो
सकता है। क्योंकि कुछ लोगों ने भ्रष्टाचार के माध्यम से
अपनी अयोग्य संतानों को भी डॉक्टर बना दिया।
हमारे संविधान में कहीं नहीं लिखा भ्रष्ट तरीके अपनाकर
अपनी अयोग्य संतानों को आगे बढाएं। इसके लिए मनु दोषी नही। हो सकता है मनुस्मृति में कुछ प्रक्षिप्त अंश डाल दिये हों जो मूल मनुस्मृति का अंग ही न हो।
मनु तो सबके लिए शिक्षा की व्यवस्था अनिवार्य करते हैं।
बिना पढ़े लिखे को विवाह का अधिकार भी नहीं देते,
जबकि वर्तमान में आजादी के 70 साल बाद भी देश का
एक वर्ग आज भी अनपढ़ है।
मनुस्मृति को नहीं समझ पाने का सबसे बड़ा कारण
अंग्रेजों ने उसके शब्दश: भाष्य किए। जिससे अर्थ का अनर्थ
हुआ। पाश्चात्य लोगों और वामपंथियों ने धर्मग्रंथों को
लेकर लोगों में भ्रांतियां भी फैलाईं। इसीलिए मनुवाद
या ब्राह्मणवाद का हल्ला ज्यादा मचा।
मनुस्मृति या भारतीय धर्मग्रंथों को मौलिक रूप में और
उसके सही भाव को समझकर पढ़ना चाहिए। विद्वानों
को भी सही और मौलिक बातों को सामने लाना
चाहिए। तभी लोगों की धारणा बदलेगी।
दाराशिकोह उपनिषद पढ़कर भारतीय धर्मग्रंथों का
भक्त बन गया था। इतिहास में उसका नाम उदार बादशाह
के नाम से दर्ज है। फ्रेंच विद्वान जैकालियट ने अपनी
पुस्तक ‘बाइबिल इन इंडिया’ में भारतीय ज्ञान विज्ञान
की खुलकर प्रशंसा की है।
पंडित, पुजारी बनने के ब्राह्मण होना जरूरी है :
पंडित और पुजारी तो ब्राह्मण ही बनेगा, लेकिन उसका
जन्मगत ब्राह्मण होना जरूरी नहीं है। यहां ब्राह्मण से
मतलब श्रेष्ठ व्यक्ति से न कि जातिगत।
आज भी सेना में धर्मगुरु पद के लिए जातिगत रूप से ब्राह्मण
होना जरूरी नहीं है बल्कि योग्य होना आवश्यक है।
ऋषि दयानंद की संस्था आर्यसमाज में हजारों विद्वान
हैं जो जन्म से ब्राह्मण नहीं हैं। इनमें सैकड़ों पूरोहित जन्म
से दलित वर्ग से आते हैं।
शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम।
क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च। (10/65)
महर्षि मनु कहते हैं कि कर्म के अनुसार ब्राह्मण शूद्रता
को प्राप्त हो जाता है और शूद्र ब्राह्मणत्व को। इसी
प्रकार क्षत्रिय और वैश्य से उत्पन्न संतान भी अन्य वर्णों
को प्राप्त हो जाया करती हैं। विद्या और योग्यता के
अनुसार सभी वर्णों की संतानें अन्य वर्ण में जा सकती हैं।

Thursday, March 10, 2016

बैलगाड़ी से "सोशल मिडिया की गाडी" तक का सफर

पहले बैलगाड़ी से चलते थे लोग ! चार घंटे में चार किलोमीटर ! अब इक्कीसवीं सदी चल रही है, सोशल साईटें चार मिनट में पूरे लोक की सैर करा देतीं हैं आपको ! ओवैसी और उमर खालिद जैसे लोग देश में खुले आम खौफनाक खेल खेलते हैं और पलभर में मंद्बुद्धियों के हीरो बन जाते हैं ! फिर कन्हैय्या जैसे छुटभैय्ये गला फाड़ कर देश के टुकड़े करने की बात करते है और राहुल , केजरी शतुघ्न सिन्हा जैसे मसीहाओं के साथ मिलकर कुंद्बुद्धियों का एक बड़ा गिरोह बना लेते हैं ! फिर न्यायाधीश महोय , जो अपने ज्ञान की हथौड़ी, सवा सौ करोड़ जनता के सर पर दे मारते हैं की लो चलो स्वीकार करो इस देश के लाडले बच्चे को , मेरे उच्च ज्ञान के अनुसार ये देशद्रोही नहीं है ! फिर लग गयी मूढ़मति जनता उस तेईस पन्ने के फैसले में दिए गए प्रवचन को वायरल करने में ! अजी जनाब आजकल के देश-तोडू , तथाकथित बचकाने-बुड्ढे टाइप छात्र तेईस मिनट भी प्रवचन नहीं सुनते बल्कि सेकंडों सेकण्ड में देशद्रोहियों का गिरोह बना डालते हैं और आप मुंह ताकते रह जाते हैं ! भ्रमित करने और सबूत मिटाने का काम भी चुटकियों में होता है ! बैलगाड़ी से सफर करना छोड़िये , लातों के भूत बातों से नहीं मानते, यदि संविधान में इन गुंडों के लिए सज़ा नहीं है तो संशोधन करके लिख डालिये नया क़ानून ! कब तक अंग्रेज़ों की गुलामी करेंगे न्याय के मंदिर में बैठकर !

Wednesday, February 24, 2016

गाँधी वध क्यों ?

क्या थी विभाजन की पीड़ा ?
विभाजन के समय हुआ क्या क्या ?
विभाजन के लिए क्या था विभिन्न राजनैतिक पार्टियों दृष्टिकोण ?
क्या थी पीड़ा पाकिस्तान से आये हिन्दू शरणार्थियों की ... मदन लाल पाहवा और विष्णु करकरे की?
क्या थी गोडसे की विवशता ?
क्या गोडसे नही जानते थे की आम आदमी को मरने में और एक राष्ट्रपिता को मरने में क्या अंतर है ?
क्या होगा परिवार का ?
कैसे कैसे कष्ट सहने पड़ेंगे परिवार और सम्बन्धियों को और मित्रों को ?
क्या था गांधी वध का वास्तविक कारण ?
क्या हुआ 30 जनवरी की रात्री को ... पुणे के ब्राह्मणों के साथ ?
क्या था सावरकर और हिन्दू महासभा का चिन्तन ?
क्या हुआ गोडसे के बाद नारायण राव आप्टे का .. कैसी नृशंस फांसी दी गयी उन्हें l
यह लेख पढने के बाद कृपया बताएं कैसे उतारेगा भारतीय जनमानस हुतात्मा पंडित नाथूराम गोडसे जी का कर्ज....
आइये इन सब सवालों के उत्तर खोजें ....
पाकिस्तान से दिल्ली की तरफ जो रेलगाड़िया आ रही थी, उनमे हिन्दू इस प्रकार बैठे थे जैसे माल की बोरिया एक के ऊपर एक रची जाती हैं.अन्दर ज्यादातर मरे हुए ही थे, गला कटे हुए lरेलगाड़ी के छप्पर पर बहुत से लोग बैठे हुए थे, डिब्बों के अन्दर सिर्फ सांस लेने भर की जगह बाकी थी l बैलगाड़िया ट्रक्स हिन्दुओं से भरे हुए थे, रेलगाड़ियों पर लिखा हुआ था,," आज़ादी का तोहफा " रेलगाड़ी में जो लाशें भरी हुई
थी उनकी हालत कुछ ऐसी थी की उनको उठाना मुश्किल था, दिल्ली पुलिस को फावड़ें में उन लाशों को भरकर उठाना पड़ा l ट्रक में भरकर किसी निर्जन स्थान पर ले जाकर, उन पर पेट्रोल के फवारे मारकर उन लाशों को जलाना पड़ा इतनी विकट हालत थी उन मृतदेहों की... भयानक बदबू......
सियालकोट से खबरे आ रही थी की वहां से हिन्दुओं को निकाला जा रहा हैं, उनके घर, उनकी खेती, पैसा-अडका, सोना-चाँदी, बर्तन सब मुसलमानों ने अपने कब्जे में ले लिए थे l मुस्लिम लीग ने सिवाय कपड़ों के कुछ भी ले जाने पर रोक लगा दी थी. किसी भी गाडी पर हल्ला करके हाथ को लगे उतनी महिलाओं- बच्चियों को भगाया गया.बलात्कार किये बिना एक भी हिन्दू स्त्री वहां से वापस नहीं आ सकती थी ... बलात्कार किये बिना.....?
जो स्त्रियाँ वहां से जिन्दा वापस आई वो अपनी वैद्यकीय जांच करवाने से डर रही थी....
डॉक्टर ने पूछा क्यों ???
उन महिलाओं ने जवाब दिया... हम आपको क्या बताये हमें क्या हुआ हैं ?
हमपर कितने लोगों ने बलात्कार किये हैं हमें भी पता नहीं हैं...उनके सारे शारीर पर चाकुओं के घाव थे.
"आज़ादी का तोहफा"
जिन स्थानों से लोगों ने जाने से मना कर दिया, उन स्थानों पर हिन्दू स्त्रियों की नग्न यात्राएं (धिंड) निकाली गयीं, बाज़ार सजाकर उनकी बोलियाँ लगायी गयीं और उनको दासियों की तरह खरीदा बेचा गया l
1947 के बाद दिल्ली में 400000 हिन्दू निर्वासित आये, और इन हिन्दुओं को जिस हाल में यहाँ आना पड़ा था, उसके बावजूद पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये देने ही चाहिए ऐसा महात्मा जी का आग्रह था...क्योकि एक तिहाई भारत के तुकडे हुए हैं तो भारत के खजाने का एक तिहाई हिस्सा पाकिस्तान को मिलना चाहिए था l
विधि मंडल ने विरोध किया, पैसा नहीं देगे....और फिर बिरला भवन के पटांगन में महात्मा जी अनशन पर बैठ गए.....पैसे दो, नहीं तो मैं मर जाउगा....एक तरफ अपने मुहँ से ये कहने वाले महात्मा जी, की हिंसा उनको पसंद नहीं हैं l
दूसरी तरफ जो हिंसा कर रहे थे उनके लिए अनशन पर बैठ गए... क्या यह हिंसा नहीं थी .. अहिंसक आतंकवाद की आड़ में
दिल्ली में हिन्दू निर्वासितों के रहने की कोई व्यवस्था नहीं थी, इससे ज्यादा बुरी बात ये थी की दिल्ली में खाली पड़ी मस्जिदों में हिन्दुओं ने शरण ली तब बिरला भवन से महात्मा जी ने भाषण में कहा की दिल्ली पुलिस को मेरा आदेश हैं मस्जिद जैसी चीजों पर हिन्दुओं का कोई
ताबा नहीं रहना चाहिए l निर्वासितों को बाहर निकालकर मस्जिदे खाली करे..क्योंकि महात्मा जी की दृष्टी में जान सिर्फ मुसलमानों में थी हिन्दुओं में नहीं...
जनवरी की कडकडाती ठंडी में हिन्दू महिलाओं और छोटे छोटे बच्चों को हाथ पकड़कर पुलिस ने मस्जिद के बाहर निकाला, गटर के किनारे
रहो लेकिन छत के निचे नहीं l क्योकि... तुम हिन्दू हो....
4000000 हिन्दू भारत में आये थे,ये सोचकर की ये भारत हमारा हैं....ये सब निर्वासित गांधीजी से मिलाने बिरला भवन जाते थे तब
गांधीजी माइक पर से कहते थे क्यों आये यहाँ अपने घर जायदाद बेचकर, वहीँ पर अहिंसात्मक प्रतिकार करके क्यों नहीं रहे ??
यही अपराध हुआ तुमसे अभी भी वही वापस जाओ..और ये महात्मा किस आशा पर पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये देने निकले थे ?
कैसा होगा वो मोहनदास करमचन्द गाजी उर्फ़ गंधासुर ... कितना महान ...
जिसने बिना तलवार उठाये ... 35 लाख हिन्दुओं का नरसंहार करवाया
2 करोड़ से ज्यादा हिन्दुओं का इस्लाम में धर्मांतरण हुआऔर उसके बाद यह संख्या 10 करोड़ भी पहुंची l
10 लाख से ज्यादा हिन्दू नारियों को खरीदा बेचा गया l
20 लाख से ज्यादा हिन्दू नारियों को जबरन मुस्लिम बना कर अपने घरों में रखा गया, तरह तरह की शारीरिक और मानसिक यातनाओं के बाद
ऐसे बहुत से प्रश्न, वास्तविकताएं और सत्य तथा तथ्य हैं जो की 1947 के समकालीन लोगों ने अपनी आने वाली पीढ़ियों से छुपाये, हिन्दू कहते हैं की जो हो गया उसे भूल जाओ, नए कल की शुरुआत करो ...
परन्तु इस्लाम के लिए तो कोई कल नहीं .. कोई आज नहीं ...वहां तो दार-उल-हर्ब को दार-उल-इस्लाम में बदलने का ही लक्ष्य है पल.. प्रति पल
विभाजन के बाद एक और विभाजन का षड्यंत्र ...
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आपने बहुत से देशों में से नए देशों का निर्माण देखा होगा, U S S R टूटने के बाद बहुत से नए देश बने, जैसे ताजिकिस्तान, कजाकिस्तान आदि ... परन्तु यह सब देश जो बने वो एक परिभाषित अविभाजित सीमा के अंदर बने l
और जब भारत का विभाजन हुआ .. तो क्या कारण थे की पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान बनाए गए... क्यों नही एक ही पाकिस्तान बनाया गया... या तो पश्चिम में बना लेते या फिर पूर्व में l
परन्तु ऐसा नही हुआ .... यहाँ पर उल्लेखनीय है की मोहनदास करमचन्द ने तो यहाँ तक कहा था की पूरा पंजाब पाकिस्तान में जाना चाहिए, बहुत कम लोगों को ज्ञात है की 1947 के समय में पंजाब की सीमा दिल्ली के नजफगढ़ क्षेत्र तक होती थी ...
यानी की पाकिस्तान का बोर्डर दिल्ली के साथ होना तय था ... मोहनदास करमचन्द के अनुसार l
नवम्बर 1968 में पंजाब में से दो नये राज्यों का उदय हुआ .. हिमाचल प्रदेश और हरियाणा l
पाकिस्तान जैसा मुस्लिम राष्ट्र पाने के बाद भी जिन्ना और मुस्लिम लीग चैन से नहीं बैठे ...
उन्होंने फिर से मांग की ... की हमको पश्चिमी पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान जाने में बहुत समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं l
1. पानी के रास्ते बहुत लम्बा सफर हो जाता है क्योंकि श्री लंका के रस्ते से घूम कर जाना पड़ता है l
2. और हवाई जहाज से यात्राएं करने में अभी पाकिस्तान के मुसलमान सक्षम नही हैं l इसलिए .... कुछ मांगें रखी गयीं 1. इसलिए हमको भारत के बीचो बीच एक Corridor बना कर दिया जाए....
2. जो लाहोर से ढाका तक जाता हो ..(NH - 1)
3. जो दिल्ली के पास से जाता हो ...
4. जिसकी चौड़ाई कम से कम 10 मील की हो ... (10 Miles = 16 KM)
5. इस पूरे Corridor में केवल मुस्लिम लोग ही रहेंगे l
30 जनवरी को गांधी वध यदि न होता, तो तत्कालीन परिस्थितियों में बच्चा बच्चा यह जानता था की यदि मोहनदास करमचन्द 3 फरवरी, 1948 को पाकिस्तान पहुँच गया तो इस मांग को भी ...मान लिया जायेगा l
तात्कालिक परिस्थितियों के अनुसार तो मोहनदास करमचन्द किसी की बात सुनने की स्थिति में था न ही समझने में ...और समय भी नहीं था जिसके कारण हुतात्मा नाथूराम गोडसे जी को गांधी वध जैसा अत्यधिक साहसी और शौर्यतापूर्ण निर्णय लेना पडा l
हुतात्मा का अर्थ होता है जिस आत्मा ने अपने प्राणों की आहुति दी हो .... जिसको की वीरगति को प्राप्त होना भी कहा जाता है l
यहाँ यह सार्थक चर्चा का विषय होना चाहिए की हुतात्मा पंडित नाथूराम गोडसे जीने क्या एक बार भी नहीं सोचा होगा की वो क्या करने जा रहे हैं ?
किसके लिए ये सब कुछ कर रहे हैं ?
उनके इस निर्णय से उनके घर, परिवार, सम्बन्धियों, उनकी जाती और उनसे जुड़े संगठनो पर क्या असर पड़ेगा ?
घर परिवार का तो जो हुआ सो हुआ .... जाने कितने जघन्य प्रकारों से समस्त परिवार और सम्बन्धियों को प्रताड़ित किया गया l
परन्तु ..... अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले मोहनदास करमचन्द के कुछ अहिंसक आतंकवादियों ने 30 जनवरी, 1948 की रात को ही पुणे में 6000 ब्राह्मणों को चुन चुन कर घर से निकाल निकाल कर जिन्दा जलाया l
10000 से ज्यादा ब्राह्मणों के घर और दुकानें जलाए गए l
सोचने का विषय यह है की उस समय संचार माध्यम इतने उच्च कोटि के नहीं थे, विकसित नही थे ... फिर कैसे 3 घंटे के अंदर अंदर इतना सुनियोजित तरीके से इतना बड़ा नरसंहार कर दिया गया ....
सवाल उठता है की ... क्या उन अहिंसक आतंकवादियों को पहले से यह ज्ञात था की गांधी वध होने वाला है ?
जस्टिस खोसला जिन्होंने गांधी वध से सम्बन्धित केस की पूरी सुनवाई की... 35 तारीखें पडीं l
अदालत ने निरीक्षण करवाया और पाया हुतात्मा पनदिर नाथूराम गोडसे जी की मानसिक दशा को तत्कालीन चिकित्सकों ने एक दम सामान्य घोषित किया l पंडित जी ने अपना अपराध स्वीकार किया पहली ही सुनवाई में और अगली 34 सुनवाइयों में कुछ नहीं बोले ... सबसे आखिरी सुनवाई में पंडित जी ने अपने शब्द कहे ""
गाँधी वध के समय न्यायमूर्ति खोसला से नाथूराम ने अपना वक्तव्य स्वयं पढ़ कर सुनाने की अनुमति मांगी थी और उसे यह अनुमति मिली थी | नाथूराम गोडसे का यह न्यायालयीन वक्तव्य भारत सरकार द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया था |इस प्रतिबन्ध के विरुद्ध नाथूराम गोडसे के भाई तथा गाँधी वध के सह अभियुक्त गोपाल गोडसे ने ६० वर्षों तक वैधानिक लडाई लड़ी और उसके फलस्वरूप सर्वोच्च न्यायलय ने इस प्रतिबन्ध को हटा लिया तथा उस वक्तव्य के प्रकाशन की अनुमति दे दी। नाथूराम गोडसे ने न्यायलय के समक्ष गाँधी वध के जो १५० कारण बताये थे उनमें से प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं -
1. अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ गोली काण्ड (1919) से समस्त देशवासी आक्रोश में थे तथा चाहते थे कि इस नरसंहार के खलनायक जनरल डायर पर अभियोग चलाया जाए। गान्धी ने भारतवासियों के इस आग्रह को समर्थन देने से मना कर दिया।
2. भगत सिंह व उसके साथियों के मृत्युदण्ड के निर्णय से सारा देश क्षुब्ध था व गान्धी की ओर देख रहा था कि वह हस्तक्षेप कर इन देशभक्तों को मृत्यु से बचाएं, किन्तु गान्धी ने भगत सिंह की हिंसा को अनुचित ठहराते हुए जनसामान्य की इस माँग को अस्वीकार कर दिया। क्या आश्चर्य कि आज भी भगत सिंह वे अन्य क्रान्तिकारियों को आतंकवादी कहा जाता है।
3. 6 मई 1946 को समाजवादी कार्यकर्ताओं को अपने सम्बोधन में गान्धी ने मुस्लिम लीग की हिंसा के समक्ष अपनी आहुति देने की प्रेरणा दी।
4.मोहम्मद अली जिन्ना आदि राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं के विरोध को अनदेखा करते हुए 1921 में गान्धी ने खिलाफ़त आन्दोलन को समर्थन देने की घोषणा की। तो भी केरल के मोपला में मुसलमानों द्वारा वहाँ के हिन्दुओं की मारकाट की जिसमें लगभग 1500 हिन्दु मारे गए व 2000 से अधिक को मुसलमान बना लिया गया। गान्धी ने इस हिंसा का विरोध नहीं किया, वरन् खुदा के बहादुर बन्दों की बहादुरी के रूप में वर्णन किया।
5.1926 में आर्य समाज द्वारा चलाए गए शुद्धि आन्दोलन में लगे स्वामी श्रद्धानन्द जी की हत्या अब्दुल रशीद नामक एक मुस्लिम युवक ने कर दी, इसकी प्रतिक्रियास्वरूप गान्धी ने अब्दुल रशीद को अपना भाई कह कर उसके इस कृत्य को उचित ठहराया व शुद्धि आन्दोलन को अनर्गल राष्ट्र-विरोधी तथा हिन्दु-मुस्लिम एकता के लिए अहितकारी घोषित किया।
6.गान्धी ने अनेक अवसरों पर छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप व गुरू गोविन्द सिंह जी को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा।
7.गान्धी ने जहाँ एक ओर काश्मीर के हिन्दु राजा हरि सिंह को काश्मीर मुस्लिम बहुल होने से शासन छोड़ने व काशी जाकर प्रायश्चित करने का परामर्श दिया, वहीं दूसरी ओर हैदराबाद के निज़ाम के शासन का हिन्दु बहुल हैदराबाद में समर्थन किया।
8. यह गान्धी ही था जिसने मोहम्मद अली जिन्ना को कायदे-आज़म की उपाधि दी।
9. कॉंग्रेस के ध्वज निर्धारण के लिए बनी समिति (1931) ने सर्वसम्मति से चरखा अंकित भगवा वस्त्र पर निर्णय लिया किन्तु गाँधी कि जिद के कारण उसे तिरंगा कर दिया गया।
10. कॉंग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बहुमत से कॉंग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया किन्तु गान्धी पट्टभि सीतारमय्या का समर्थन कर रहा था, अत: सुभाष बाबू ने निरन्तर विरोध व असहयोग के कारण पदत्याग कर दिया।
11. लाहोर कॉंग्रेस में वल्लभभाई पटेल का बहुमत से चुनाव सम्पन्न हुआ किन्तु गान्धी की जिद के कारण यह पद जवाहरलाल नेहरु को दिया गया।
12. 14-15 जून, 1947 को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कॉंग्रेस समिति की बैठक में भारत विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था, किन्तु गान्धी ने वहाँ पहुंच प्रस्ताव का समर्थन करवाया। यह भी तब जबकि उन्होंने स्वयं ही यह कहा था कि देश का विभाजन उनकी लाश पर होगा।
13. मोहम्मद अली जिन्ना ने गान्धी से विभाजन के समय हिन्दु मुस्लिम जनसँख्या की सम्पूर्ण अदला बदली का आग्रह किया था जिसे गान्धी ने अस्वीकार कर दिया।
14. जवाहरलाल की अध्यक्षता में मन्त्रीमण्डल ने सोमनाथ मन्दिर का सरकारी व्यय पर पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित किया, किन्तु गान्धी जो कि मन्त्रीमण्डल के सदस्य भी नहीं थे ने सोमनाथ मन्दिर पर सरकारी व्यय के प्रस्ताव को निरस्त करवाया और 13 जनवरी 1948 को आमरण अनशन के माध्यम से सरकार पर दिल्ली की मस्जिदों का सरकारी खर्चे से पुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला।
15. पाकिस्तान से आए विस्थापित हिन्दुओं ने दिल्ली की खाली मस्जिदों में जब अस्थाई शरण ली तो गान्धी ने उन उजड़े हिन्दुओं को जिनमें वृद्ध, स्त्रियाँ व बालक अधिक थे मस्जिदों से से खदेड़ बाहर ठिठुरते शीत में रात बिताने पर मजबूर किया गया।
16. 22 अक्तूबर 1947 को पाकिस्तान ने काश्मीर पर आक्रमण कर दिया, उससे पूर्व माउँटबैटन ने भारत सरकार से पाकिस्तान सरकार को 55 करोड़ रुपए की राशि देने का परामर्श दिया था। केन्द्रीय मन्त्रीमण्डल ने आक्रमण के दृष्टिगत यह राशि देने को टालने का निर्णय लिया किन्तु गान्धी ने उसी समय यह राशि तुरन्त दिलवाने के लिए आमरण अनशन किया- फलस्वरूप यह राशि पाकिस्तान को भारत के हितों के विपरीत दे दी गयी।
उपरोक्त परिस्थितियों में नथूराम गोडसे नामक एक देशभक्त सच्चे भारतीय युवक ने गान्धी का वध कर दिया।
न्य़यालय में चले अभियोग के परिणामस्वरूप गोडसे को मृत्युदण्ड मिला किन्तु गोडसे ने न्यायालय में अपने कृत्य का जो स्पष्टीकरण दिया उससे प्रभावित होकर उस अभियोग के न्यायधीश श्री जे. डी. खोसला ने अपनी एक पुस्तक में लिखा-
"नथूराम का अभिभाषण दर्शकों के लिए एक आकर्षक दृश्य था। खचाखच भरा न्यायालय इतना भावाकुल हुआ कि लोगों की आहें और सिसकियाँ सुनने में आती थींऔर उनके गीले नेत्र और गिरने वाले आँसू दृष्टिगोचर होते थे। न्यायालय में उपस्थित उन प्रेक्षकों को यदि न्यायदान का कार्य सौंपा जाता तो मुझे तनिक भी संदेह नहीं कि उन्होंने अधिकाधिक सँख्या में यह घोषित किया होता कि नथूराम निर्दोष है।"
तो भी नथूराम ने भारतीय न्यायव्यवस्था के अनुसार एक व्यक्ति की हत्या के अपराध का दण्ड मृत्युदण्ड के रूप में सहज ही स्वीकार किया। परन्तु भारतमाता के विरुद्ध जो अपराध गान्धी ने किए, उनका दण्ड भारतमाता व उसकी सन्तानों को भुगतना पड़ रहा है। यह स्थिति कब बदलेगी?
प्रश्न यह भी उठता है की पंडित नाथूराम गोडसे जी ने तो गाँधी वध किया उन्हें पैशाचिक कानूनों के द्वारा मृत्यु दंड दिया गया परन्तु नाना जी आप्टे ने तो गोली नहीं मारी थी ... उन्हें क्यों मृत्युदंड दिया गया ?
नाथूराम गोडसे को सह अभियुक्त नाना आप्टे के साथ १५ नवम्बर १९४९ को पंजाब के अम्बाला की जेल में मृत्यु दंड दे दिया गया। उन्होंने अपने अंतिम शब्दों में कहा था...
यदि अपने देश के प्रति भक्तिभाव रखना कोई पाप है तो मैंने वो पाप किया है और यदि यह पुन्य हिया तो उसके द्वारा अर्जित पुन्य पद पर मैं अपना नम्र अधिकार व्यक्त करता हूँ
– पंडित नाथूराम गोडसे

Sunday, February 14, 2016

कुतर्की देशभक्तों के लिए

बहुत दिनों से पढ़ रही हूँ लोगों का ये तर्क कि जब नाथूराम गोडसे को देशभक्त कहा जाएगा तो आतंकवादी अफज़ल गुरु को भी शहीद कहा जाएगा ! क्या तर्क करने वाले विद्वानों को दोनों का अंतर और इतिहास नहीं पता?
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अब किसी कि हत्या करना को अपराध कि श्रेणी में ही आएगा , फिर चाहे कोई भी करे और गोडसे ने अपनी सज़ा अपने अपराध करने से पहले ही कबूल कर ली थी, इसलिए गोडसे ने देश के दो टुकड़े करने वाले और मुस्लिम तुिष्टिकरण करने वाले एक व्यक्ति को मारा था ! अपराध कि सजा भी मिल गयी थी उन्हें !
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अब बात हुयी आतंकवादियों कि ! ये निर्दोष आम जनता को बम से उड़ाते हैं , संसद पर हमला करते हैं, देश कि समृद्धि को नष्ट करते हैं ! इन देशद्रोही आतंकियों से सहानुभूति रखने वाला और इनकी वकालत करने वाला हर व्यक्ति देशद्रोही है !
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लोग बड़े जज़्बाती होकर ये तो बोल देते हैं फलां को उसके अपराध के लिए गोली मार दो , लेकिन उसे कर गुजरने का दम बहुत कम लोगों में होता है ! यदि आपमें ये दम नहीं तो ऐसी बात बोलिए भी नहीं ! या तो खुद गोली मारिये अपराधी को या फिर कोर्ट के फैसले का इंतज़ार करिये !
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नाथूराम गोडसे के बारे में कुतर्क करने से पहले उनको जान लें एक बार ! नाथूराम निसंदेह एक क्रांतिकारी देशभक्त थे ! उन्हीं के शब्दों में जानिये उन्होंने गांधी-वध क्यों किया ! हर बात का जवाब जानने के लिए थोड़ी मेहनत तो करनी पड़ती है न !
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WHY I KILLED GANDHI
Born in a devotional Brahmin family, I instinctively came to revere
Hindu religion, Hindu history, and Hindu culture. I had, therefore,
been intensely proud of Hinduism as a whole. As I grew up I developed
a tendency to free thinking unfettered by any superstitious allegiance
to any isms, political or religious. That is why I worked actively for
the eradication of untouchables and the caste system based on birth
alone. I openly joined RSS wing of anti-caste movements and maintained
that all Hindus were of equal status as to rights, social, and
religious and should be considered high or low on merit alone and not
through the accident of birth in a particular caste or profession.
I used publicly to take part in organized anti-caste dinners in which
thousands of Hindus, Brahmins, Kshatriyas, Vaisyas, Chamars and
Bhangis participated. We broke the caste rules and dined in the
company of each other. I have read the speeches and writings of
Ravana, Chanakiya, Dadabhai Naoroji, Vivekanand, Gokhale, Tilak, along
with the books of ancient and modern history of India and some
prominent countries like England, France, America and Russia.
Moreover I studied the tenets of Socialism and Marxism. But above all
I studied very closely whatever Veer Savarkar and Gandhiji had written
and spoken, as to my mind these two ideologies have contributed more
to the molding of the thought and action of the Indian people during
the last thirty years or so, than any other single factor has done.
All this reading and thinking led me to believe it was my first duty
to serve Hinduism and Hindus both as a patriot and as a world citizen.
To secure the freedom and to safeguard the just interests of some
thirty crores (300 million) of Hindus would automatically constitute
the freedom and the well-being of all India, one fifth of human race.
This conviction led me naturally to devote myself to the Hindu
Sanghtanist ideology and program, which alone, I came to believe,
could win and preserve the national independence of Hindustan , my
Motherland, and enable her to render true service to humanity as well.
Since the year 1920, that is, after the demise of Lokamanya Tilak,
Gandhijis' influence in the Congress first increased and then became
supreme. His activities for public awakening were phenomenal in their
intensity and were reinforced by the slogan of truth and non-violence
which he paraded ostentatiously before the country. No sensible or
enlightened person could object to those slogans. In fact there is
nothing new or original in them. They are implicit in every
constitutional public movement. But it is nothing but a mere dream if
you imagine that the bulk of mankind is, or can ever become, capable
of scrupulous adherence to these lofty principles in its normal life
from day to day.
In fact, honour, duty, and love of ones' own kith and kin and country
might often compel us to disregard non-violence and to use force. I
could never conceive that an armed resistance to an aggression is
unjust. I would consider it a religious and moral duty to resist and,
if possible, to overpower such an enemy by use of force. In the
Ramayana, Rama killed Ravana in a tumultuous fight and relieved Sita.
In the Mahabharata, Krishna killed Kansa to end his wickedness; and
Arjuna had to fight and slay quite a number of his friends and
relations including the revered Bhishma because the latter was on the
side of the aggressor. It is my firm belief that in dubbing Rama,
Krishna, and Arjuna as guilty of violence, the Mahatma betrayed a
total ignorance of the springs of human action.
In more recent history, it was the heroic fight put up by Chhatrapati
Shivaji that first checked and eventually destroyed the Muslim tyranny
in India. It was absolutely essentially for Shivaji to overpower and
kill an aggressive Afzal Khan, failing which he would have lost his
own life. In condemning historys' towering warriors like Shivaji, Rana
Pratap and Guru Gobind Singh as misguided patriots, Gandhiji has
merely exposed his self-conceit. He was, paradoxical as it may appear
a violent pacifist who brought untold calamities on the country in the
name of truth and non-violence, while Rana Pratap, Shivaji, and the
Guru will remain enshrined in the hearts of their countrymen for ever
for the freedom they brought to them.
The accumulating provocation of thirty-two years, culminating in his
last pro-Muslim fast, at last goaded me to the conclusion that the
existence of Gandhi should be brought to an end immediately. Gandhi
had done very well in South Africa to uphold the rights and well-being
of the Indian community there. But when he finally returned to India
he developed a subjective mentality under which he alone was to be the
final judge of what was right or wrong. If the country wanted his
leadership, it had to accept his infallibility; if it did not, he would stand aloof
from the Congress and carry on his own way.
Against such an attitude there can be no halfway house. Either
Congress had to surrender its will to his and had to be content with
playing second fiddle to all his eccentricity, whimsicality, metaphysics
and primitive vision, or it had to carry on without him.
He alone was the Judge of everyone and every thing; he was the master
brain guiding the civil disobedience movement; no other could know the
technique of that movement. He alone knew when to begin and when to
withdraw it. The movement might succeed or fail, it might bring untold
disaster, and political reverses but that could make no difference to
the Mahatma's infallibility.
'A Satyagrahi can never fail' was hisformula for declaring his own
infallibility and nobody except himself knew what a Satyagrahi is.
Thus, the Mahatma became the judge and jury in his own cause.
These childish insanities and obstinacies, coupled with a most severe
austerity of life, ceaseless work and lofty character made Gandhi
formidable and irresistible.
Many people thought that his politics were irrational but they had
either to withdraw from the Congress or place their intelligence at
his feet to do with as he liked. In a position of such absolute
irresponsibility Gandhi was guilty of blunder after blunder, failure
after failure, disaster after disaster.
Gandhi's pro-Muslim policy is blatantly in his perverse attitude on the
question of the national language of India. It is quite obvious that
Hindi has the most prior claim to be accepted as the premier language.
In the beginning of his career in India, Gandhi gave a great impetus to
Hindi but as he found that the Muslims did not like it, he became a
champion of what is called Hindustani.
Everybody in India knows that there is no language
called Hindustani; it has no grammar; it has no vocabulary. It is a
mere dialect, it is spoken, but not written. It is a bastard tongue
and cross-breed between Hindi and Urdu, and not even the Mahatmas'
sophistry could make it popular.
But, in his desire to please the Muslims, he insisted that Hindustani alone
should be the national language of India. His blind followers, of course,
supported him and the so-called hybrid language began to be used. The
charm and purity of the Hindi language was to be prostituted to please the
Muslims. All his experiments were at the expense of the Hindus.
From August 1946 onwards, the private armies of the Muslim League
began a massacre of the Hindus. The then Viceroy, Lord Wavell, though
distressed at what was happening, would not use his powers under the Government
of India Act of 1935 to prevent the rape, murder and arson.
The Hindu blood began to flow from Bengal to Karachi with some retaliation
by the Hindus. The Interim Government formed in September was sabotaged
by its Muslim League members' right from its inception, but the more they
became disloyal and treasonable to the government of which they were a part,
the greater was Gandhis infatuation for them.
Lord Wavell had to resign as he could not bring about a settlement and he was
succeeded by Lord Mountbatten. King Log was followed by King Stork.
The Congress which had boasted of its nationalism and socialism secretly accepted
Pakistanliterally at the point of the bayonet and abjectly surrendered to Jinnah.
Indiawas vivisected and one-third of the Indian territory became foreign land
to us from August 15, 1947.
Lord Mount batten came to be described in Congress circles as the
greatest Viceroy and Governor-General this country ever had. The
official date for handing over power was fixed for June 30, 1948, but
Mountbatten, with his ruthless surgery, gave us a gift of vivisected
India ten months in advance.
This is what Gandhi had achieved after thirty years of undisputed
dictatorship and this is what Congress party calls 'freedom' and 'peaceful
transfer of power'. The Hindu-Muslim unity bubble was finally burst and
a the ocratic state was established with the consent of Nehru and his
crowd and they have called 'freedom won by them with sacrifice' - whose sacrifice?
When top leaders of Congress, with the consent of Gandhi, divided and tore
the country - which we consider a deity of worship - my mind was filled with
direful anger.
One of the conditions imposed by Gandhi for his breaking of the fast
unto death related to the mosques in Delhi occupied by the Hindu
refugees. But when Hindus in Pakistan were subjected to violent
attacks he did not so much as utter a single word to protest and
censure the Pakistan Government or the Muslims concerned.
Gandhi was shrewd enough to know that while undertaking a fast unto
death, had he imposed for its break some condition on the Muslims in
Pakistan, there would have been found hardly any Muslims who could
have shown some grief if the fast had ended in his death.
It was for this reason that he purposely avoided imposing any condition
on the Muslims. He was fully aware of from the experience that Jinnah
was not at all perturbed or influenced by his fast, and the Muslim League
hardly attached any value to the inner voice of Gandhi.
Gandhi is being referred to as the Father of the Nation. But if that is so,
he had failed his paternal duty in as much as he has acted very
treacherously to the nation by his consenting to the partitioning of it.
I stoutly maintain that Gandhi has failed in his duty.
He has proved to be the Father of Pakistan. His inner-voice, his
spiritual power and his doctrine of non-violence of which so much is
made of, all crumbled before Jinnah's iron will, and proved to be
powerless.
Briefly speaking, I thought to myself and foresaw I shall be totally ruined,
and the only thing I could expect from the people would be nothing but
hatred and that I shall have lost my entire honor, even more valuable
than my life, if I were to kill Gandhiji. Bu,t at the same time, I felt that the
Indian politics, in the absence of Gandhiji, would surely be proved practical,
able to retaliate, and would be powerful with armed forces.
No doubt, my own future would be totally ruined, but the nation would
be saved from the inroads of Pakistan. People may even call me and
dub me as devoid of any sense or foolish, but the nation would be free
to follow the course founded on the reason which I consider to be
necessary for sound nation-building.
After having fully considered the question, I took the final decision
in the matter, but I did not speak about it to anyone whatsoever. I
took courage in both my hands and I did fire the shots at Gandhiji on
30th January 1948, on the prayer-grounds of Birla House.
I do say that my shots were fired at the person whose policy and action
had brought rack and ruin and destruction to millions of Hindus. There
was no legal machinery by which such an offender could be brought to
book and for this reason I fired those fatal shots. I bear no ill will towards
anyone individually but I do say that I had no respect for the present
government owing to their policy which was unfairly favorable towards
the Muslims. But at the same time I could clearly see that the policy
was entirely due to the presence of Gandhi.
I have to say with great regret that Primes Minister Nehru quite
forgets that his preachings and deeds are at times at variances with
each other when he talks about India as a secular state in season and
out of season, because it is significant to note that Nehru has played
a leading role in the establishment of the theocratic state of
Pakistan, and his job was made easier by Gandhis' persistent policy of
appeasement towards the Muslims.
I now stand before the court to accept the full share of my responsibility
for what I have done and the judge would, of course, pass against me
such orders of sentence as may be considered proper. But I would like
to add that I do not desire any mercy to be shown to me, nor do I wish
that anyone else should beg for mercy on my behalf.
My confidence about the moral side of my action has not been shaken
even by the criticism leveled against it on all sides. I have no doubt
that honest writers of history will weighs my act and find the true
value thereof some day in future.
JAI HIND !!
NOW YOU DECIDE HOW HISTORY SHOULD JUDGE ME- Nathuram Godse

Thursday, January 21, 2016

रोहित सुसाइड केस और गिद्धों की दावत

आमतौर पर कोई भी घटना हो, समाज दो धड़ों में बंटा दिखता है ! एक सरकार विरोधी हिस्सा तत्काल ही जातिवाद का कार्ड खेलकर, घटना का राजनितिक लाभ लेने लगता है , दूसरा हिस्सा सरकार की अंधाधुंध पैरवी करने लगता है मानो रामराज हो और गलतियों की कोई गुंजाइश ही न हो ! एक निष्पक्ष बुद्धिजीवी समाज कहाँ है जो पूरी घटना पर का निष्पक्ष अवलोकन कर बीमारी की जड़ को पकड़ सके ?
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कोई भी घटना , क्रमबद्ध कई चरणों में सामने आती है ! अतः किसी निष्कर्ष पर पहुँचने तक बहुत धैर्य भी रखना होता है, अन्यथा आपकी उग्रता और रोहित वेमूला की उग्रता में कोई अंतर नहीं रह जाता ! समाज में कितने याकूब मेनन बनेंगे वो पता नहीं लेकिन इस समाज में रोहित वेमूला असंख्य हैं , ये बात अब तक साबित हो चुकी है ! समझदार सरकार और समझदार जनता से ये अपेक्षा की जाती है की वे इस तरह की घटनाओं से संज्ञान में लें और सचेत रहें ! इनकी पुनरावृत्ति न हो इस बात की कोशिश की जाए !
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अब बात आती है की रोहित किस तरह का लड़का था ! जहां तक मुझे समझ आता है, वो एक दिग्भ्रमित , पूर्ण रूप से भटका हुआ लड़का था जो अपनी अज्ञानतावश अपने धर्म , अपने महापुरुषों और संस्कृति के साथ खिड़वाड़ कर रहा था ! उम्र में बच्चा था, कान का कच्चा था जो दूसरों के बहकावे में आसानी से आ जाता था ! देश समाज और परिवार के प्रति दायित्वों को कतई नहीं समझता था ! व्यवस्था से तंग आकर और संभवतः अपनी गलतियों का एहसास करके उसने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली ! कोई लाभ नहीं हुआ किसी का ! न देश का , न परिवार का , न ही समाज का ! केवल गिद्धों के झुण्ड की दावत हो गयी !
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अब इस घटना पर गिद्धों के झुण्ड ने अपनी राजनितिक रोटियां भी सेंकनी शुरू कर दीं! कुछ गैरजिम्मेदार प्रोफेसरों ने इस्तीफा देने की धमकी शुरू कर दी ! कुछ संतई करने वाले नेताओं ने विश्वविद्यालय की यात्रा करने की घोषणा कर दी , मानो उनके चरणकमल वहां पड़ने से कोई चमत्कार हो जाएगा ! .
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अरे गलती इन्हीं प्रोफेसरों की है , जो अपने छात्रों को दिग्भ्रमित होने से रोक नहीं पाये और इनके छात्र उग्रवादी निकल रहे हैं ! और सबसे बड़ी गलती, पिछले सत्तर सालों से देश में, वोटों की राजनीति करने वाली कांग्रेस , भाजपा , समाजवादी, बसपा , आआप और अन्य सभी क्षेत्रीय पार्टियों की है जो आरक्षण देकर काबिलों का हक़ छीनती है और ऐसे लोगों को मुफ्तखोरी की आदत डालकर पहले उनका स्वाभिमान छीनती है , फिर अनावश्यक अनुपात में उन्हें महत्वाकांक्षी बना देती है ! वे बेचारे नट-नटी के इस खेल में संतुलन बनाये नहीं रख पाते और असंतुलित मस्तिष्क के साथ अपने दुखदायी-अंजाम को प्राप्त हो जाते हैं !